Tuesday, March 27, 2012

किंग की कर्जखोरी का किंगफिशर काण्ड

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किंग की कर्जखोरी का किंगफिशर काण्ड

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किंग की कर्जखोरी का किंगफिशर काण्ड

भारतीय एविएशन उद्योग में "के' क्लास के साथ मैदान में उतरी किंगफिशर की कहानी शायद खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है. असीम आकाश में उड़ान भरने निकली किंगफिशर अब अपनी गतिविधियों को समेट रही है. हालांकि अफवाहों के बीच एक अफवाह यह भी है कि किंगफिशर कहीं नहीं जाएगी और अपने आपको दोबारा पुनर्गठित करके मैदान में बनी रहेगी लेकिन इन खबरों के अलावा इस पूरे प्रकरण में जिस एक बात पर चर्चा बिल्कुल नहीं हो रही है वह यह कि किंगफिशर के राजा के रंक हो जाने की कहानी क्या है? करीब साठ हजार करोड़ की बाजार पूंजीवाले यूबी समूह की यह एयरलाइन्स कंपनी इतनी कंगाल कैसे हो गई कि व्यापार बढ़ाने में विश्वास करनेवाले विजय माल्या किंगफिशर समेटने में जुट गये हैं. कर्जखोरी के किंगफिर काण्ड पर विजय भाटिया का विश्लेषण-

सरकार को सद्बुद्धि आई और उसने प्रत्यक्ष तौर पर गरीब के धन से अमीर को उबारने का जिम्मा उठाने से मना कर दिया. सरकार की इस मनाही के बाद किंगफिशर और किंगफिशर के किंग विजय माल्या दोनों ही डांवाडोल हालत में जा पहुंचे हैं. लेकिन वे सरकार की मनाही के बाद इस डांवाडोल अवस्था में आये हों ऐसा नहीं है. वित्त जगत पर नजर रखनेवाले लोग जानते हैं कि कंपनी लंबे समय से इसी तरह डांवाडोल हालत में है. यह कंपनी महीनों से दिवालिया होने की हालत में है. न उसके पैरों में अपने बूते खड़े रहने की ताकत है और न ही पंख पसारकर हवा में उड़ने की कूबत. इसलिए आज की छंटनी, मरनी करनी का आखिरी परिणाम होगा कि आखिरकार किंगफिशर को दिवालिया करार दे दिया जाएगा. यूबी समूह के लिए किंगफिशर का दिवालिया होना भले ही दिवाली जैसा हो लेकिन अगर कंपनी दिवालिया करार दी जाती है तो वे दिवालिया जरूर हो जाएंगे जिन्होंने माल्या के भरोसे पर किंगफिशर में पैसा झोंक रखा है.

2005 में शुरू की गई किंगफिशर एयरलाइन्स कंपनी की आज बाजार में कीमत 1250 करोड़ रूपया है. (शेयर बाजार के हिसाब से इसमें उतार चढ़ाव हो सकता है.) इस 1250 करोड़ की किंगफिशर कंपनी में मालिक विजय माल्या की हिस्सेदारी है 58 प्रतिशत. अगर किंगफिशर के डैने (पंख) समेट लिये जाते हैं तो हमारे माननीय सांसद विजय माल्या कोई 730 करोड़ रूपये का निवेश गंवा देंगे, लेकिन नुकसान उन्हीं का अकेले नहीं होगा. कई और हैं जिनका बंटाढार हो जाएगा.

पहला नंबर आयेगा उन वाणिज्यिक बैंकों का जिन्होंने माल्या के किंगफिशर में पैसा लगा रखा है. इसमें सबसे आगे हमारा स्टेट बैंक आफ इंडिया जिसने कुछ समय पहले घनघोर बेवकूफी में इस कंपनी के बकाया कर्ज को माफ कर उसे कंपनी में 23 प्रतिशत की हिस्सेदारी में बदल दिया था. इसका मतलब यह हुआ कि कर्ज के बल पर खड़ा किया गया किंगफिशर अगर डूबता है तो सीधे सीधे स्टेट बैंक आफ इंडिया के 291 करोड़ रूपये डूब जाएंगे.

दूसरे नंबर पर फिर होंगे वाणिज्यिक बैंक जिसमें फिर आगे होगा स्टेट बैंक आफ इंडिया. क्योंकि इस हवाई कंपनी के खाते इन्हीं वाणिज्यिक बैंकों में हैं. आखिरी गिनती के समय कंपनी पर कोई 7000 करोड़ के कर्जे बकाया थे. कर्जों पर लदा ब्याज बढ़ रहा है इसलिए ये कर्जे हर दिन बढ़ रहे हैं. कंपनी को दिवालिया घोषित करने और उसके कर्जों को खत्म करने की नौबत आते आते यह कर्जा 8,000 करोड़ तक पहुंच सकता है. लेकिन दिवालिया होने की दिवाली जिस दिन मनाई जाएगी उस दिन बैंक कुर्की करने के लिए दौड़ेगे. अपनी पूंजी को दोबारा पाने का यही उनके पास आखिरी हथियार होता है. लेकिन जब बैंक कुर्की करने के लिए दौड़ेगे तो उनके हाथ में कुछ नहीं आयेगा. उन्हें कोई संपत्ति नहीं मिलेगी. कारण? इस कंपनी ने कोई हवाई जहाज खरीदा ही नहीं. कंपनी के पास जो कुल 16 जहाज हैं वे किराये के हैं, बाकी उसने लंबे चौड़े जहाजों का आर्डर जरूर कर रखा है. जब बैंक कुर्की करने जाएंगे तो किराये के ये जहाज उन्हीं के मत्थे पड़ सकते हैं क्योंकि तब उन्हें यह भी देखना होगा कि इन जहाजों का किराया चुकाया गया है या नहीं.

तीसरे स्थान पर आयेंगी सरकारी तेल कंपनियां जैसे इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम जो इस एयरलाइन्स को ईंधन बेंचती हैं. व्यापार में उधार पर खरीदना और देर से चुकता करना यह सब तो चलता ही रहता है. पर इस मामले में यह उधारी छोटी मोटी नहीं है. पूरी उधारी करीब एक हजार करोड़ के आस पास है इसलिए तेल में आग लग जाए तो कहा नहीं जा सकता.

चौथे स्थान पर है भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और उसके साझीदार जैसे मुंबई और दिल्ली के निजी प्रबंधन में काम करनेवाले हवाई अड्डे. ऐसा माना जाता है कि इस कंपनी को इन हवाई अड्डों पर जहाज उतारने, खड़ा करने, सवारियों का चढ़ाने उतारने और जहाज को उड़ाने की सुविधाओं, सेवाओं के लिए जो पैसा देना था वह किंगफिशर के खाते में बकाया है. यही कोई 250 करोड़ रूपये.

किंगफिशर के दिवालिया होने की हालत में आयकर विभाग और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को 422 करोड़ रूपये की चपत लगेगी. कंपनी ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह में से यह सब पहले ही काट लिया है लेकिन न तो उसने सरकार को दिया है और न ही कर्मचारियों के कोटे में भविष्य निधि में जमा किया है.

किंगफिशर के दिवालिया होने की हालत में छठे नंबर पर चोट खायेंगे वे यात्री जो अब तक के क्लास का मजा ले रहे थे. जो के क्लब के सदस्य हैं या फिर लंबी अवधि की बुकिंग कराये बैठे हैं उनके पैसे डूब जाएंगे. अगर अनुमान के लिए एक तिहाई ग्राहकों का आकड़ा ही लें तो किंगफिशर के पास करीब 2000 करोड़ रूपये जमा होने चाहिए.

सातवें और आखिरी नंबर पर आते हैं वे 7000 हजार कर्मचारी जिनमें से आधे को अलविदा कहने की खबरें आने लगी हैं. इन सात हजार कर्मचारियों का भविष्य आगे क्या होगा यह न तो उन्हें पता है और न ही उनके किंग विजय माल्या को. इन कर्मचारियों को करीब साठ करोड़ की चपत लगेगी जिसमें उनकी ग्रेच्युटी, छोटे मोटे भत्ते और छुट्टियों की कमाई शामिल नहीं है.

खुदा न करे, कल को किंगफिशर अपने आपको दिवालिया करार दे दे तो किंगफिशर के किंग जरूर अपना 730 करोड़ रूपये का निवेश गंवा देंगे लेकिन हमारे आप जैसे आम आदमी को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी 11,000 करोड़ रूपये. कर्जखोरी से व्यापार खड़ा करने और उसे निजी मुनाफे के साथ दिवालिया करार करवा देने का यह खेल थोड़ा अजीब है जो आसानी से समझ में नहीं आता है. कहने के लिए तो मालिक के 730 करोड़ भी डूब रहे हैं लेकिन कर्ज की कीमत पर खड़ी की गई ऐसी कंपनियों में मालिकाना हक भी मुफ्त का ही होता है. इसलिए उनके हर एक रूपये के नुकसान पर हमारे 15 रूपये मिट जाएंगे. पता नहीं सरकार और किंगफिशर के बीच क्या बातचीत चल रही है लेकिन किंगफिशर के किंग सरकार को यह तो कह ही सकते हैं कि आप मेरी एयरलाइन्स को डुबोना चाहें तो डुबो दें पर जितने गहरे गड्ढे में मैं गिरूंगा उससे गहरी खाई में आप चले जाएंगे.

कर्जखोर किंग के ऐसा सोचने का कारण है. वित्त और वाणिज्य की दुनिया में यह कहा जाता है कि अगर बैंक का आपके ऊपर 10 हजार रूपये का कर्ज है तो यह आपकी समस्या है लेकिन अगर यह कर्ज 10 हजार करोड़ है तो फिर समस्या आपकी नहीं बल्कि बैंक और वित्तीय संस्थान की है. उद्योगपति और व्यापारी इसे अच्छी तरह जानते हैं. उन्हें यह बात बखूबी पता है कि एक रूपये का निवेश दिखाकर दस रूपये का कर्ज कैसे लिया जाता है. किंगफिशर ने भी यही खेल किया है और साठ हजार करोड़ की सशक्त बाजार पूंजीवाले यूबी समूह में शामिल होते हुए भी दिलालिये होने के रास्ते पर आराम से आगे बढ़ गई है.


किंग की कर्जखोरी का किंगफिशर काण्ड


भारतीय एविएशन उद्योग में "के' क्लास के साथ मैदान में उतरी किंगफिशर की कहानी शायद खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है. असीम आकाश में उड़ान भरने निकली किंगफिशर अब अपनी गतिविधियों को समेट रही है. हालांकि अफवाहों के बीच एक अफवाह यह भी है कि किंगफिशर कहीं नहीं जाएगी और अपने आपको दोबारा पुनर्गठित करके मैदान में बनी रहेगी लेकिन इन खबरों के अलावा इस पूरे प्रकरण में जिस एक बात पर चर्चा बिल्कुल नहीं हो रही है वह यह कि किंगफिशर के राजा के रंक हो जाने की कहानी क्या है? करीब साठ हजार करोड़ की बाजार पूंजीवाले यूबी समूह की यह एयरलाइन्स कंपनी इतनी कंगाल कैसे हो गई कि व्यापार बढ़ाने में विश्वास करनेवाले विजय माल्या किंगफिशर समेटने में जुट गये हैं. कर्जखोरी के किंगफिर काण्ड पर विजय भाटिया का विश्लेषण-

सरकार को सद्बुद्धि आई और उसने प्रत्यक्ष तौर पर गरीब के धन से अमीर को उबारने का जिम्मा उठाने से मना कर दिया. सरकार की इस मनाही के बाद किंगफिशर और किंगफिशर के किंग विजय माल्या दोनों ही डांवाडोल हालत में जा पहुंचे हैं. लेकिन वे सरकार की मनाही के बाद इस डांवाडोल अवस्था में आये हों ऐसा नहीं है. वित्त जगत पर नजर रखनेवाले लोग जानते हैं कि कंपनी लंबे समय से इसी तरह डांवाडोल हालत में है. यह कंपनी महीनों से दिवालिया होने की हालत में है. न उसके पैरों में अपने बूते खड़े रहने की ताकत है और न ही पंख पसारकर हवा में उड़ने की कूबत. इसलिए आज की छंटनी, मरनी करनी का आखिरी परिणाम होगा कि आखिरकार किंगफिशर को दिवालिया करार दे दिया जाएगा. यूबी समूह के लिए किंगफिशर का दिवालिया होना भले ही दिवाली जैसा हो लेकिन अगर कंपनी दिवालिया करार दी जाती है तो वे दिवालिया जरूर हो जाएंगे जिन्होंने माल्या के भरोसे पर किंगफिशर में पैसा झोंक रखा है.

2005 में शुरू की गई किंगफिशर एयरलाइन्स कंपनी की आज बाजार में कीमत 1250 करोड़ रूपया है. (शेयर बाजार के हिसाब से इसमें उतार चढ़ाव हो सकता है.) इस 1250 करोड़ की किंगफिशर कंपनी में मालिक विजय माल्या की हिस्सेदारी है 58 प्रतिशत. अगर किंगफिशर के डैने (पंख) समेट लिये जाते हैं तो हमारे माननीय सांसद विजय माल्या कोई 730 करोड़ रूपये का निवेश गंवा देंगे, लेकिन नुकसान उन्हीं का अकेले नहीं होगा. कई और हैं जिनका बंटाढार हो जाएगा.

पहला नंबर आयेगा उन वाणिज्यिक बैंकों का जिन्होंने माल्या के किंगफिशर में पैसा लगा रखा है. इसमें सबसे आगे हमारा स्टेट बैंक आफ इंडिया जिसने कुछ समय पहले घनघोर बेवकूफी में इस कंपनी के बकाया कर्ज को माफ कर उसे कंपनी में 23 प्रतिशत की हिस्सेदारी में बदल दिया था. इसका मतलब यह हुआ कि कर्ज के बल पर खड़ा किया गया किंगफिशर अगर डूबता है तो सीधे सीधे स्टेट बैंक आफ इंडिया के 291 करोड़ रूपये डूब जाएंगे.

दूसरे नंबर पर फिर होंगे वाणिज्यिक बैंक जिसमें फिर आगे होगा स्टेट बैंक आफ इंडिया. क्योंकि इस हवाई कंपनी के खाते इन्हीं वाणिज्यिक बैंकों में हैं. आखिरी गिनती के समय कंपनी पर कोई 7000 करोड़ के कर्जे बकाया थे. कर्जों पर लदा ब्याज बढ़ रहा है इसलिए ये कर्जे हर दिन बढ़ रहे हैं. कंपनी को दिवालिया घोषित करने और उसके कर्जों को खत्म करने की नौबत आते आते यह कर्जा 8,000 करोड़ तक पहुंच सकता है. लेकिन दिवालिया होने की दिवाली जिस दिन मनाई जाएगी उस दिन बैंक कुर्की करने के लिए दौड़ेगे. अपनी पूंजी को दोबारा पाने का यही उनके पास आखिरी हथियार होता है. लेकिन जब बैंक कुर्की करने के लिए दौड़ेगे तो उनके हाथ में कुछ नहीं आयेगा. उन्हें कोई संपत्ति नहीं मिलेगी. कारण? इस कंपनी ने कोई हवाई जहाज खरीदा ही नहीं. कंपनी के पास जो कुल 16 जहाज हैं वे किराये के हैं, बाकी उसने लंबे चौड़े जहाजों का आर्डर जरूर कर रखा है. जब बैंक कुर्की करने जाएंगे तो किराये के ये जहाज उन्हीं के मत्थे पड़ सकते हैं क्योंकि तब उन्हें यह भी देखना होगा कि इन जहाजों का किराया चुकाया गया है या नहीं.

तीसरे स्थान पर आयेंगी सरकारी तेल कंपनियां जैसे इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम जो इस एयरलाइन्स को ईंधन बेंचती हैं. व्यापार में उधार पर खरीदना और देर से चुकता करना यह सब तो चलता ही रहता है. पर इस मामले में यह उधारी छोटी मोटी नहीं है. पूरी उधारी करीब एक हजार करोड़ के आस पास है इसलिए तेल में आग लग जाए तो कहा नहीं जा सकता.

चौथे स्थान पर है भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और उसके साझीदार जैसे मुंबई और दिल्ली के निजी प्रबंधन में काम करनेवाले हवाई अड्डे. ऐसा माना जाता है कि इस कंपनी को इन हवाई अड्डों पर जहाज उतारने, खड़ा करने, सवारियों का चढ़ाने उतारने और जहाज को उड़ाने की सुविधाओं, सेवाओं के लिए जो पैसा देना था वह किंगफिशर के खाते में बकाया है. यही कोई 250 करोड़ रूपये.

किंगफिशर के दिवालिया होने की हालत में आयकर विभाग और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को 422 करोड़ रूपये की चपत लगेगी. कंपनी ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह में से यह सब पहले ही काट लिया है लेकिन न तो उसने सरकार को दिया है और न ही कर्मचारियों के कोटे में भविष्य निधि में जमा किया है.

किंगफिशर के दिवालिया होने की हालत में छठे नंबर पर चोट खायेंगे वे यात्री जो अब तक के क्लास का मजा ले रहे थे. जो के क्लब के सदस्य हैं या फिर लंबी अवधि की बुकिंग कराये बैठे हैं उनके पैसे डूब जाएंगे. अगर अनुमान के लिए एक तिहाई ग्राहकों का आकड़ा ही लें तो किंगफिशर के पास करीब 2000 करोड़ रूपये जमा होने चाहिए.

सातवें और आखिरी नंबर पर आते हैं वे 7000 हजार कर्मचारी जिनमें से आधे को अलविदा कहने की खबरें आने लगी हैं. इन सात हजार कर्मचारियों का भविष्य आगे क्या होगा यह न तो उन्हें पता है और न ही उनके किंग विजय माल्या को. इन कर्मचारियों को करीब साठ करोड़ की चपत लगेगी जिसमें उनकी ग्रेच्युटी, छोटे मोटे भत्ते और छुट्टियों की कमाई शामिल नहीं है.

खुदा न करे, कल को किंगफिशर अपने आपको दिवालिया करार दे दे तो किंगफिशर के किंग जरूर अपना 730 करोड़ रूपये का निवेश गंवा देंगे लेकिन हमारे आप जैसे आम आदमी को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी 11,000 करोड़ रूपये. कर्जखोरी से व्यापार खड़ा करने और उसे निजी मुनाफे के साथ दिवालिया करार करवा देने का यह खेल थोड़ा अजीब है जो आसानी से समझ में नहीं आता है. कहने के लिए तो मालिक के 730 करोड़ भी डूब रहे हैं लेकिन कर्ज की कीमत पर खड़ी की गई ऐसी कंपनियों में मालिकाना हक भी मुफ्त का ही होता है. इसलिए उनके हर एक रूपये के नुकसान पर हमारे 15 रूपये मिट जाएंगे. पता नहीं सरकार और किंगफिशर के बीच क्या बातचीत चल रही है लेकिन किंगफिशर के किंग सरकार को यह तो कह ही सकते हैं कि आप मेरी एयरलाइन्स को डुबोना चाहें तो डुबो दें पर जितने गहरे गड्ढे में मैं गिरूंगा उससे गहरी खाई में आप चले जाएंगे.

कर्जखोर किंग के ऐसा सोचने का कारण है. वित्त और वाणिज्य की दुनिया में यह कहा जाता है कि अगर बैंक का आपके ऊपर 10 हजार रूपये का कर्ज है तो यह आपकी समस्या है लेकिन अगर यह कर्ज 10 हजार करोड़ है तो फिर समस्या आपकी नहीं बल्कि बैंक और वित्तीय संस्थान की है. उद्योगपति और व्यापारी इसे अच्छी तरह जानते हैं. उन्हें यह बात बखूबी पता है कि एक रूपये का निवेश दिखाकर दस रूपये का कर्ज कैसे लिया जाता है. किंगफिशर ने भी यही खेल किया है और साठ हजार करोड़ की सशक्त बाजार पूंजीवाले यूबी समूह में शामिल होते हुए भी दिलालिये होने के रास्ते पर आराम से आगे बढ़ गई है.

(विजय भाटिया स्टैण्डर्ड चार्टर्ड बैंक में काम कर चुके हैं. वित्त जगत की धोखाधड़ी से ऊबकर अब कुछ नहीं करते सिर्फ जिंदगी जीने की कला सीख रहे हैं और बच्चों को सिखा रहे हैं.)

किंग की कर्जखोरी का किंगफिशर काण्ड


भारतीय एविएशन उद्योग में "के' क्लास के साथ मैदान में उतरी किंगफिशर की कहानी शायद खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है. असीम आकाश में उड़ान भरने निकली किंगफिशर अब अपनी गतिविधियों को समेट रही है. हालांकि अफवाहों के बीच एक अफवाह यह भी है कि किंगफिशर कहीं नहीं जाएगी और अपने आपको दोबारा पुनर्गठित करके मैदान में बनी रहेगी लेकिन इन खबरों के अलावा इस पूरे प्रकरण में जिस एक बात पर चर्चा बिल्कुल नहीं हो रही है वह यह कि किंगफिशर के राजा के रंक हो जाने की कहानी क्या है? करीब साठ हजार करोड़ की बाजार पूंजीवाले यूबी समूह की यह एयरलाइन्स कंपनी इतनी कंगाल कैसे हो गई कि व्यापार बढ़ाने में विश्वास करनेवाले विजय माल्या किंगफिशर समेटने में जुट गये हैं. कर्जखोरी के किंगफिर काण्ड पर विजय भाटिया का विश्लेषण-

सरकार को सद्बुद्धि आई और उसने प्रत्यक्ष तौर पर गरीब के धन से अमीर को उबारने का जिम्मा उठाने से मना कर दिया. सरकार की इस मनाही के बाद किंगफिशर और किंगफिशर के किंग विजय माल्या दोनों ही डांवाडोल हालत में जा पहुंचे हैं. लेकिन वे सरकार की मनाही के बाद इस डांवाडोल अवस्था में आये हों ऐसा नहीं है. वित्त जगत पर नजर रखनेवाले लोग जानते हैं कि कंपनी लंबे समय से इसी तरह डांवाडोल हालत में है. यह कंपनी महीनों से दिवालिया होने की हालत में है. न उसके पैरों में अपने बूते खड़े रहने की ताकत है और न ही पंख पसारकर हवा में उड़ने की कूबत. इसलिए आज की छंटनी, मरनी करनी का आखिरी परिणाम होगा कि आखिरकार किंगफिशर को दिवालिया करार दे दिया जाएगा. यूबी समूह के लिए किंगफिशर का दिवालिया होना भले ही दिवाली जैसा हो लेकिन अगर कंपनी दिवालिया करार दी जाती है तो वे दिवालिया जरूर हो जाएंगे जिन्होंने माल्या के भरोसे पर किंगफिशर में पैसा झोंक रखा है.

2005 में शुरू की गई किंगफिशर एयरलाइन्स कंपनी की आज बाजार में कीमत 1250 करोड़ रूपया है. (शेयर बाजार के हिसाब से इसमें उतार चढ़ाव हो सकता है.) इस 1250 करोड़ की किंगफिशर कंपनी में मालिक विजय माल्या की हिस्सेदारी है 58 प्रतिशत. अगर किंगफिशर के डैने (पंख) समेट लिये जाते हैं तो हमारे माननीय सांसद विजय माल्या कोई 730 करोड़ रूपये का निवेश गंवा देंगे, लेकिन नुकसान उन्हीं का अकेले नहीं होगा. कई और हैं जिनका बंटाढार हो जाएगा.

पहला नंबर आयेगा उन वाणिज्यिक बैंकों का जिन्होंने माल्या के किंगफिशर में पैसा लगा रखा है. इसमें सबसे आगे हमारा स्टेट बैंक आफ इंडिया जिसने कुछ समय पहले घनघोर बेवकूफी में इस कंपनी के बकाया कर्ज को माफ कर उसे कंपनी में 23 प्रतिशत की हिस्सेदारी में बदल दिया था. इसका मतलब यह हुआ कि कर्ज के बल पर खड़ा किया गया किंगफिशर अगर डूबता है तो सीधे सीधे स्टेट बैंक आफ इंडिया के 291 करोड़ रूपये डूब जाएंगे.

दूसरे नंबर पर फिर होंगे वाणिज्यिक बैंक जिसमें फिर आगे होगा स्टेट बैंक आफ इंडिया. क्योंकि इस हवाई कंपनी के खाते इन्हीं वाणिज्यिक बैंकों में हैं. आखिरी गिनती के समय कंपनी पर कोई 7000 करोड़ के कर्जे बकाया थे. कर्जों पर लदा ब्याज बढ़ रहा है इसलिए ये कर्जे हर दिन बढ़ रहे हैं. कंपनी को दिवालिया घोषित करने और उसके कर्जों को खत्म करने की नौबत आते आते यह कर्जा 8,000 करोड़ तक पहुंच सकता है. लेकिन दिवालिया होने की दिवाली जिस दिन मनाई जाएगी उस दिन बैंक कुर्की करने के लिए दौड़ेगे. अपनी पूंजी को दोबारा पाने का यही उनके पास आखिरी हथियार होता है. लेकिन जब बैंक कुर्की करने के लिए दौड़ेगे तो उनके हाथ में कुछ नहीं आयेगा. उन्हें कोई संपत्ति नहीं मिलेगी. कारण? इस कंपनी ने कोई हवाई जहाज खरीदा ही नहीं. कंपनी के पास जो कुल 16 जहाज हैं वे किराये के हैं, बाकी उसने लंबे चौड़े जहाजों का आर्डर जरूर कर रखा है. जब बैंक कुर्की करने जाएंगे तो किराये के ये जहाज उन्हीं के मत्थे पड़ सकते हैं क्योंकि तब उन्हें यह भी देखना होगा कि इन जहाजों का किराया चुकाया गया है या नहीं.

तीसरे स्थान पर आयेंगी सरकारी तेल कंपनियां जैसे इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम जो इस एयरलाइन्स को ईंधन बेंचती हैं. व्यापार में उधार पर खरीदना और देर से चुकता करना यह सब तो चलता ही रहता है. पर इस मामले में यह उधारी छोटी मोटी नहीं है. पूरी उधारी करीब एक हजार करोड़ के आस पास है इसलिए तेल में आग लग जाए तो कहा नहीं जा सकता.

चौथे स्थान पर है भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और उसके साझीदार जैसे मुंबई और दिल्ली के निजी प्रबंधन में काम करनेवाले हवाई अड्डे. ऐसा माना जाता है कि इस कंपनी को इन हवाई अड्डों पर जहाज उतारने, खड़ा करने, सवारियों का चढ़ाने उतारने और जहाज को उड़ाने की सुविधाओं, सेवाओं के लिए जो पैसा देना था वह किंगफिशर के खाते में बकाया है. यही कोई 250 करोड़ रूपये.

किंगफिशर के दिवालिया होने की हालत में आयकर विभाग और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को 422 करोड़ रूपये की चपत लगेगी. कंपनी ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह में से यह सब पहले ही काट लिया है लेकिन न तो उसने सरकार को दिया है और न ही कर्मचारियों के कोटे में भविष्य निधि में जमा किया है.

किंगफिशर के दिवालिया होने की हालत में छठे नंबर पर चोट खायेंगे वे यात्री जो अब तक के क्लास का मजा ले रहे थे. जो के क्लब के सदस्य हैं या फिर लंबी अवधि की बुकिंग कराये बैठे हैं उनके पैसे डूब जाएंगे. अगर अनुमान के लिए एक तिहाई ग्राहकों का आकड़ा ही लें तो किंगफिशर के पास करीब 2000 करोड़ रूपये जमा होने चाहिए.

सातवें और आखिरी नंबर पर आते हैं वे 7000 हजार कर्मचारी जिनमें से आधे को अलविदा कहने की खबरें आने लगी हैं. इन सात हजार कर्मचारियों का भविष्य आगे क्या होगा यह न तो उन्हें पता है और न ही उनके किंग विजय माल्या को. इन कर्मचारियों को करीब साठ करोड़ की चपत लगेगी जिसमें उनकी ग्रेच्युटी, छोटे मोटे भत्ते और छुट्टियों की कमाई शामिल नहीं है.

खुदा न करे, कल को किंगफिशर अपने आपको दिवालिया करार दे दे तो किंगफिशर के किंग जरूर अपना 730 करोड़ रूपये का निवेश गंवा देंगे लेकिन हमारे आप जैसे आम आदमी को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी 11,000 करोड़ रूपये. कर्जखोरी से व्यापार खड़ा करने और उसे निजी मुनाफे के साथ दिवालिया करार करवा देने का यह खेल थोड़ा अजीब है जो आसानी से समझ में नहीं आता है. कहने के लिए तो मालिक के 730 करोड़ भी डूब रहे हैं लेकिन कर्ज की कीमत पर खड़ी की गई ऐसी कंपनियों में मालिकाना हक भी मुफ्त का ही होता है. इसलिए उनके हर एक रूपये के नुकसान पर हमारे 15 रूपये मिट जाएंगे. पता नहीं सरकार और किंगफिशर के बीच क्या बातचीत चल रही है लेकिन किंगफिशर के किंग सरकार को यह तो कह ही सकते हैं कि आप मेरी एयरलाइन्स को डुबोना चाहें तो डुबो दें पर जितने गहरे गड्ढे में मैं गिरूंगा उससे गहरी खाई में आप चले जाएंगे.

कर्जखोर किंग के ऐसा सोचने का कारण है. वित्त और वाणिज्य की दुनिया में यह कहा जाता है कि अगर बैंक का आपके ऊपर 10 हजार रूपये का कर्ज है तो यह आपकी समस्या है लेकिन अगर यह कर्ज 10 हजार करोड़ है तो फिर समस्या आपकी नहीं बल्कि बैंक और वित्तीय संस्थान की है. उद्योगपति और व्यापारी इसे अच्छी तरह जानते हैं. उन्हें यह बात बखूबी पता है कि एक रूपये का निवेश दिखाकर दस रूपये का कर्ज कैसे लिया जाता है. किंगफिशर ने भी यही खेल किया है और साठ हजार करोड़ की सशक्त बाजार पूंजीवाले यूबी समूह में शामिल होते हुए भी दिलालिये होने के रास्ते पर आराम से आगे बढ़ गई है.

(विजय भाटिया स्टैण्डर्ड चार्टर्ड बैंक में काम कर चुके हैं. वित्त जगत की धोखाधड़ी से ऊबकर अब कुछ नहीं करते सिर्फ जिंदगी जीने की कला सीख रहे हैं और बच्चों को सिखा रहे हैं.)

गड़बड़ा गया भाजपा का गडकरी फार्मूला


भाजपा अध्यक्ष का पार्टी के ही अंदर विकासवादी फार्मूल फेल कर रहा है भाजपा अध्यक्ष का पार्टी के ही अंदर विकासवादी फार्मूल फेल कर रहा है

आरएसएस ने यह सोचकर नितिन गडकरी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था कि वे पार्टी को विचारधारा के अनुसार ठीक कर देंगे. अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि वे उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति बेहतर करते. नितिन गडकरी ने अपने स्तर पर हर संभव कोशिश भी की और बीते पांच विधानसभा चुनाव गडकरी फार्मूले पर ही लड़े गये. लेकिन गोवा को छोड़ दें, तो उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश में भाजपा किनारे लग गई. उत्तर प्रदेश के बाद कर्नाटक संकट और झारखण्ड में राज्यसभा सीट के लिए हुए बवाल ने पार्टी के शीर्ष अध्यक्ष नितिन गडकरी को घोर संकट में डाल दिया है. नितिन गडकरी की सफलता असफलता को आंकने के साथ साथ यह जानना भी जरूरी है कि क्या आरएसएस का गडकरी फार्मूला गड़बड़ा गया है? शेष नारायण सिंह का विश्लेषण-

भारतीय जनता पार्टी में नेतृत्व का संकट गहराता ही जा रहा है .कर्नाटक में पार्टी की दुविधा बहुत ही भारी है. राज्य में बीजेपी के सबसे बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंन्त्री बीएस येदुरप्पा किसी भी वक़्त पार्टी तोड़ देने पर आमादा हैं. ताज़ा घटनाक्रम से लगता है कि बीएस येदुरप्पा ने बीजेपी आलाकमान को थोड़ी राहत देने का फैसला कर लिया है क्योंकि खबर है कि अब वे मौजूदा मुख्य मंत्री, सदानंद गौड़ा को बजट पेश करने की अनुमति दे देगें. यानी कर्नाटक सरकार के सामने मौजूद फौरी संकट ख़त्म हो गया है लेकिन इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि संकट सही मायनों में ख़त्म हो गया है. कर्नाटक की राजनीति के जानकार बताते हैं कि बीजेपी को कर्नाटक में अपने आप को एक राजनीतिक पार्टी के रूप में बचाए रखने का एक ही तरीका है कि वह बी एस येदुरप्पा की मांग स्वीकार कर ले और उन्हेंमुख्या मंत्री की कुर्सी दुबारा सौंप दे. उनके पास बीजेपी के १२० विधायाकों में से ६६ का समर्थन है. यह वह समर्थक हैं जो येदुरप्पा के साथ जाकर रिजार्ट में छुपे थे. यह भी तय है कि मौजूदा मुख्यमंत्री भी अभी कुछ महीने पहले तक बी एस येदुरप्पा के बहुत करीबी और उनके भक्त थे इसलिए कर्नाटक में बीजेपी के लिए येदुरप्पा को हटाकर अपने आपको एक मज़बूत राजनीतिक पार्टी के रूप में बचा पाना बहुत ही मुश्किल होगा.

लेकिन बी एस येदुरप्पा की छवि एक ऐसे नेता की बन गयी है जिसके साथ भ्रष्टाचार बहुत ही गंभीरता से जुड़ गया है. भ्रष्टाचार के कुछ् मामले उजागर हो जाने के बाद ही बीजेपी आलाकमान ने कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदला था. भ्रष्टाचार में डूबी कांग्रेस पार्टी के ऊपर बीजेपी के हमलों को बेमतलब साबित करने के लिए बीजेपी के विरोधी कर्नाटक में बी एस येदुरप्पा के भ्रष्टाचार का उदाहरण देते थे. अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आन्दोलन से भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल को भी अपने राजनीतिक हित में बीजेपी वाले नहीं इस्तेमाल कर सके क्योंकि उनके पास भी येदुरप्पा जैसे लोगों के भ्रष्टाचार का बोझ था. येदुरप्पा के बचाव में बहुत दिनों तक बीजेपी आलाकमान खड़ा रहा और जब हटाया तो बहुत देर हो चुकी थी और उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में हुए विधान सभा चुनावों में बीजेपी भ्रष्टाचार को मुद्दा नहीं बना सकी क्योंकि भ्रष्टाचार के कीचड में बीजेपी के विरोधी तो डुबकियां लगा ही रहे थे, वह खुद भी बीजेपी बी एस येदुरप्पा और रमेश पोखरियाल निश्शंक जैसे लोगों को ले कर चलने के लिए मजबूर थी जिनके नाम के भ्रष्टाचार की बहुत सारी कहानियाँ जुड़ चुकी हैं.

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों के ठीक पहले बीजेपी ने एक और बड़ी राजनीतिक गलती की. राज्य में हज़ारों करोड़ रूपये के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एन आर एच एम घोटाले में शामिल राज्य के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को बहुत ही सम्मानपूर्वक पार्टी में शामिल कर लिया गया . पार्टी के बाहर और पार्टी के भीतर बहुत तेज़ हल्ला गुल्ला शुरू हो गया और बाबू सिंह कुशवाहा की सदस्यता को कुछ दिन के लिए टाल दिया गया लेकिन विधानसभा चुनाव में बाबू सिंह कुशवाहा पूरी ताक़त के साथ जुटे रहे और बीजेपी के उम्मीदवारों का प्रचार करते रहे. इस एक घटना ने बीजेपी को भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने लायक नहीं छोड़ा और बीजेपी को भारी चुनावी नुकसान हुआ. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही पार्टी ने उत्तराखंड में भी चुनाव के कुछ महीने पहले ही कथित रूप से भ्रष्ट मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निश्शंक को हटाया था लेकिन इस बात की कोई सफाई नहीं दी जा सकी कि एक भ्रष्ट मुख्य मंत्री को राज्य में क्यों इतने लम्बे समय तक तक इंचार्ज बनाकर रखा गया.

बीजेपी और भ्रष्टाचार के बीच के गहरे संबंधों के बारे में जो नया मामला आया है वह तो पार्टी की जड़ें हिला देने की ताक़त रखता है. राज्य सभा में बीजेपी के उपनेता, एसएस अहलूवालिया का राज्यसभा का टिकट काट कर लन्दन के एक व्यापारी को झारखण्ड से उम्मीदवार बना दिया गया है. हालांकि वह बंदा पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार नहीं है लेकिन पार्टी के विधायाकों ने उसकी नामजदगी के कागजों पर दस्तखत किया है और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उसे आशीर्वाद दिया है. लगता है कि दिल्ली में जमे जमाये अपनी पार्टी के बड़े नेताओं पर अपनी अथारिटी को स्थापित करने के उद्देश्य से नितिन गडकरी कुछ ऐसे फैसले ले लेते हैं जिनकी वजह से बीजेपी को अपनी बहुत मेहनत से बनायी गयी छवि को संभाल पाना भारी पड़ जाता है.

नागपुर की कृपा से पार्टी के अध्यक्ष बने गडकरी को दिल्ली वाले नेताओं ने स्वीकार भले ही कर लिया हो लेकिन वे अभी तक नितिन गडकरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के काबिल नहीं मानते. शायद इसी कारण से बीते मंगलवार को नई दिल्ली में हुई बीजेपी संसदीय दल की बैठक में कई बड़े नेता राज्यसभा में उपनेता, एस एस अहलुवालिया के टिकट काटने से नाराज़ दिखे. लोकसभा सदस्य और पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने तो पार्टी छोड़ने तक की धमकी दे डाली. एस एस अहलूवालिया का टिकट काटने का मामला उनके राज्य , झारखण्ड से सम्बंधित है. यशवंत सिन्हा झारखण्ड के हजारीबाग़ क्षेत्र से ही लोकसभा के लिए चुने गए हैं. यशवंत सिन्हा ने बीजेपी संसदीय पार्टी की बैठक में जो कुछ भी कहा वह बहुत ही ज़ोरदार तरीके से पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व पर प्रहार करता है. बैठक के बाद जब यशवंत सिन्हा बाहर आये तो उन्होंने मीडिया से कहा कि उन्हें पता चला है कि बीजेपी के समर्थन से किसी व्यक्ति ने झारखण्ड से राज्य सभा के लिए उम्मीदवारी का परचा भरा है .जब यह श्रीमानजी पर्चा दाखिल कर रहे थे तो बीजेपी एक बड़े नेता वहां मौजूद थे . इसका सीधा मतलब यह है कि इस उम्मीदवार को बीजेपी का समर्थन मिला हुआ है. यशवंत सिन्हा के अलावा लाल कृष्ण अडवाणी, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी आदि ने भी झारखण्ड के मामले में नाराजगी जताई. सदस्यों का गुस्सा तब शांत हुआ जब लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि वे पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी से इस मामले में बात करेगें.

बताते हैं कि बीजेपी संसदीय पार्टी के अंदर यशवंत सिन्हा ने जो बातें कहीं वे तो बहुत ही सख्त हैं. उन्होंने कहा कि बीजेपी के किसी एमएलए को नीलाम नहीं किया जाना चाहिए और किसी दागी उम्मीदवार को राज्यसभा में नहीं लाना चाहिए. यशवंत सिन्हा निराश हैं और कहते हैं कि ऐसी हालत में उनके लिए संसद में रहकर काम कर पाना बहुत मुश्किल होगा. यानी अगर बात नहीं संभली तो यशवंत सिन्हा बीजेपी से अलग भी हो सकते हैं. झारखण्ड का उम्मीदवार तो वास्तव में मामूली आदमी है यशवंत सिन्हा और अन्य संसद सदस्यों का हमला पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी के कामकाज के तरीके पर है. बीजेपी के कई बड़े नेता मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में जिस तरह से विधान सभा चुनावों का संचालन किया गया वह भी नितिन गडकरी के नेतृत्व शक्ति पर सवालिया निशान लगाता है. उन्होंने उत्तर प्रदेश के पार्टी नेताओं के ऊपर मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को जिस तरह से स्थापित किया उसके कारण भी राज्य में बीजेपी को भारी नुकसान हुआ, पार्टी के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष को हार का मुंह देखना पड़ा.

ऐसी हालत में साफ़ नज़र आता है कि बीजेपी में राष्टीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की स्वीकार्यता पूरी तरह से घट रही है. ताज़ा खबर यह है कि वे नागपुर में हैं और वहां से दिल्ली और बंगलूरू के नेताओं पर दबाव बनाकर अपनी राजनीतिक मजबूती को सुनिश्चित करना चाहते हैं. ऐसा होना संभव है क्योंकि नागपुर के आरएसएस मुख्यालय से ही उनको पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था और बीजेपी में आम तौर पर आर एस एस के आला नेतृत्व को चुनौती देने की कोई परंपरा नहीं है. लेकिन यह बात तय है कि नितिन गडकरी पार्टी के शीर्ष पर मौजूद होने के बाद भी अपनी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं बना पाए हैं.

गड़बड़ा गया भाजपा का गडकरी फार्मूला


भाजपा अध्यक्ष का पार्टी के ही अंदर विकासवादी फार्मूल फेल कर रहा है भाजपा अध्यक्ष का पार्टी के ही अंदर विकासवादी फार्मूल फेल कर रहा है

आरएसएस ने यह सोचकर नितिन गडकरी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था कि वे पार्टी को विचारधारा के अनुसार ठीक कर देंगे. अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि वे उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति बेहतर करते. नितिन गडकरी ने अपने स्तर पर हर संभव कोशिश भी की और बीते पांच विधानसभा चुनाव गडकरी फार्मूले पर ही लड़े गये. लेकिन गोवा को छोड़ दें, तो उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश में भाजपा किनारे लग गई. उत्तर प्रदेश के बाद कर्नाटक संकट और झारखण्ड में राज्यसभा सीट के लिए हुए बवाल ने पार्टी के शीर्ष अध्यक्ष नितिन गडकरी को घोर संकट में डाल दिया है. नितिन गडकरी की सफलता असफलता को आंकने के साथ साथ यह जानना भी जरूरी है कि क्या आरएसएस का गडकरी फार्मूला गड़बड़ा गया है? शेष नारायण सिंह का विश्लेषण-

भारतीय जनता पार्टी में नेतृत्व का संकट गहराता ही जा रहा है .कर्नाटक में पार्टी की दुविधा बहुत ही भारी है. राज्य में बीजेपी के सबसे बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंन्त्री बीएस येदुरप्पा किसी भी वक़्त पार्टी तोड़ देने पर आमादा हैं. ताज़ा घटनाक्रम से लगता है कि बीएस येदुरप्पा ने बीजेपी आलाकमान को थोड़ी राहत देने का फैसला कर लिया है क्योंकि खबर है कि अब वे मौजूदा मुख्य मंत्री, सदानंद गौड़ा को बजट पेश करने की अनुमति दे देगें. यानी कर्नाटक सरकार के सामने मौजूद फौरी संकट ख़त्म हो गया है लेकिन इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि संकट सही मायनों में ख़त्म हो गया है. कर्नाटक की राजनीति के जानकार बताते हैं कि बीजेपी को कर्नाटक में अपने आप को एक राजनीतिक पार्टी के रूप में बचाए रखने का एक ही तरीका है कि वह बी एस येदुरप्पा की मांग स्वीकार कर ले और उन्हेंमुख्या मंत्री की कुर्सी दुबारा सौंप दे. उनके पास बीजेपी के १२० विधायाकों में से ६६ का समर्थन है. यह वह समर्थक हैं जो येदुरप्पा के साथ जाकर रिजार्ट में छुपे थे. यह भी तय है कि मौजूदा मुख्यमंत्री भी अभी कुछ महीने पहले तक बी एस येदुरप्पा के बहुत करीबी और उनके भक्त थे इसलिए कर्नाटक में बीजेपी के लिए येदुरप्पा को हटाकर अपने आपको एक मज़बूत राजनीतिक पार्टी के रूप में बचा पाना बहुत ही मुश्किल होगा.

लेकिन बी एस येदुरप्पा की छवि एक ऐसे नेता की बन गयी है जिसके साथ भ्रष्टाचार बहुत ही गंभीरता से जुड़ गया है. भ्रष्टाचार के कुछ् मामले उजागर हो जाने के बाद ही बीजेपी आलाकमान ने कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदला था. भ्रष्टाचार में डूबी कांग्रेस पार्टी के ऊपर बीजेपी के हमलों को बेमतलब साबित करने के लिए बीजेपी के विरोधी कर्नाटक में बी एस येदुरप्पा के भ्रष्टाचार का उदाहरण देते थे. अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आन्दोलन से भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल को भी अपने राजनीतिक हित में बीजेपी वाले नहीं इस्तेमाल कर सके क्योंकि उनके पास भी येदुरप्पा जैसे लोगों के भ्रष्टाचार का बोझ था. येदुरप्पा के बचाव में बहुत दिनों तक बीजेपी आलाकमान खड़ा रहा और जब हटाया तो बहुत देर हो चुकी थी और उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में हुए विधान सभा चुनावों में बीजेपी भ्रष्टाचार को मुद्दा नहीं बना सकी क्योंकि भ्रष्टाचार के कीचड में बीजेपी के विरोधी तो डुबकियां लगा ही रहे थे, वह खुद भी बीजेपी बी एस येदुरप्पा और रमेश पोखरियाल निश्शंक जैसे लोगों को ले कर चलने के लिए मजबूर थी जिनके नाम के भ्रष्टाचार की बहुत सारी कहानियाँ जुड़ चुकी हैं.

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों के ठीक पहले बीजेपी ने एक और बड़ी राजनीतिक गलती की. राज्य में हज़ारों करोड़ रूपये के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एन आर एच एम घोटाले में शामिल राज्य के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को बहुत ही सम्मानपूर्वक पार्टी में शामिल कर लिया गया . पार्टी के बाहर और पार्टी के भीतर बहुत तेज़ हल्ला गुल्ला शुरू हो गया और बाबू सिंह कुशवाहा की सदस्यता को कुछ दिन के लिए टाल दिया गया लेकिन विधानसभा चुनाव में बाबू सिंह कुशवाहा पूरी ताक़त के साथ जुटे रहे और बीजेपी के उम्मीदवारों का प्रचार करते रहे. इस एक घटना ने बीजेपी को भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने लायक नहीं छोड़ा और बीजेपी को भारी चुनावी नुकसान हुआ. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही पार्टी ने उत्तराखंड में भी चुनाव के कुछ महीने पहले ही कथित रूप से भ्रष्ट मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निश्शंक को हटाया था लेकिन इस बात की कोई सफाई नहीं दी जा सकी कि एक भ्रष्ट मुख्य मंत्री को राज्य में क्यों इतने लम्बे समय तक तक इंचार्ज बनाकर रखा गया.

बीजेपी और भ्रष्टाचार के बीच के गहरे संबंधों के बारे में जो नया मामला आया है वह तो पार्टी की जड़ें हिला देने की ताक़त रखता है. राज्य सभा में बीजेपी के उपनेता, एसएस अहलूवालिया का राज्यसभा का टिकट काट कर लन्दन के एक व्यापारी को झारखण्ड से उम्मीदवार बना दिया गया है. हालांकि वह बंदा पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार नहीं है लेकिन पार्टी के विधायाकों ने उसकी नामजदगी के कागजों पर दस्तखत किया है और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उसे आशीर्वाद दिया है. लगता है कि दिल्ली में जमे जमाये अपनी पार्टी के बड़े नेताओं पर अपनी अथारिटी को स्थापित करने के उद्देश्य से नितिन गडकरी कुछ ऐसे फैसले ले लेते हैं जिनकी वजह से बीजेपी को अपनी बहुत मेहनत से बनायी गयी छवि को संभाल पाना भारी पड़ जाता है.

नागपुर की कृपा से पार्टी के अध्यक्ष बने गडकरी को दिल्ली वाले नेताओं ने स्वीकार भले ही कर लिया हो लेकिन वे अभी तक नितिन गडकरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के काबिल नहीं मानते. शायद इसी कारण से बीते मंगलवार को नई दिल्ली में हुई बीजेपी संसदीय दल की बैठक में कई बड़े नेता राज्यसभा में उपनेता, एस एस अहलुवालिया के टिकट काटने से नाराज़ दिखे. लोकसभा सदस्य और पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने तो पार्टी छोड़ने तक की धमकी दे डाली. एस एस अहलूवालिया का टिकट काटने का मामला उनके राज्य , झारखण्ड से सम्बंधित है. यशवंत सिन्हा झारखण्ड के हजारीबाग़ क्षेत्र से ही लोकसभा के लिए चुने गए हैं. यशवंत सिन्हा ने बीजेपी संसदीय पार्टी की बैठक में जो कुछ भी कहा वह बहुत ही ज़ोरदार तरीके से पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व पर प्रहार करता है. बैठक के बाद जब यशवंत सिन्हा बाहर आये तो उन्होंने मीडिया से कहा कि उन्हें पता चला है कि बीजेपी के समर्थन से किसी व्यक्ति ने झारखण्ड से राज्य सभा के लिए उम्मीदवारी का परचा भरा है .जब यह श्रीमानजी पर्चा दाखिल कर रहे थे तो बीजेपी एक बड़े नेता वहां मौजूद थे . इसका सीधा मतलब यह है कि इस उम्मीदवार को बीजेपी का समर्थन मिला हुआ है. यशवंत सिन्हा के अलावा लाल कृष्ण अडवाणी, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी आदि ने भी झारखण्ड के मामले में नाराजगी जताई. सदस्यों का गुस्सा तब शांत हुआ जब लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि वे पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी से इस मामले में बात करेगें.

बताते हैं कि बीजेपी संसदीय पार्टी के अंदर यशवंत सिन्हा ने जो बातें कहीं वे तो बहुत ही सख्त हैं. उन्होंने कहा कि बीजेपी के किसी एमएलए को नीलाम नहीं किया जाना चाहिए और किसी दागी उम्मीदवार को राज्यसभा में नहीं लाना चाहिए. यशवंत सिन्हा निराश हैं और कहते हैं कि ऐसी हालत में उनके लिए संसद में रहकर काम कर पाना बहुत मुश्किल होगा. यानी अगर बात नहीं संभली तो यशवंत सिन्हा बीजेपी से अलग भी हो सकते हैं. झारखण्ड का उम्मीदवार तो वास्तव में मामूली आदमी है यशवंत सिन्हा और अन्य संसद सदस्यों का हमला पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी के कामकाज के तरीके पर है. बीजेपी के कई बड़े नेता मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में जिस तरह से विधान सभा चुनावों का संचालन किया गया वह भी नितिन गडकरी के नेतृत्व शक्ति पर सवालिया निशान लगाता है. उन्होंने उत्तर प्रदेश के पार्टी नेताओं के ऊपर मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को जिस तरह से स्थापित किया उसके कारण भी राज्य में बीजेपी को भारी नुकसान हुआ, पार्टी के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष को हार का मुंह देखना पड़ा.

ऐसी हालत में साफ़ नज़र आता है कि बीजेपी में राष्टीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की स्वीकार्यता पूरी तरह से घट रही है. ताज़ा खबर यह है कि वे नागपुर में हैं और वहां से दिल्ली और बंगलूरू के नेताओं पर दबाव बनाकर अपनी राजनीतिक मजबूती को सुनिश्चित करना चाहते हैं. ऐसा होना संभव है क्योंकि नागपुर के आरएसएस मुख्यालय से ही उनको पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था और बीजेपी में आम तौर पर आर एस एस के आला नेतृत्व को चुनौती देने की कोई परंपरा नहीं है. लेकिन यह बात तय है कि नितिन गडकरी पार्टी के शीर्ष पर मौजूद होने के बाद भी अपनी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं बना पाए हैं.