भारतीय एविएशन उद्योग में "के' क्लास के साथ मैदान में उतरी किंगफिशर की कहानी शायद खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है. असीम आकाश में उड़ान भरने निकली किंगफिशर अब अपनी गतिविधियों को समेट रही है. हालांकि अफवाहों के बीच एक अफवाह यह भी है कि किंगफिशर कहीं नहीं जाएगी और अपने आपको दोबारा पुनर्गठित करके मैदान में बनी रहेगी लेकिन इन खबरों के अलावा इस पूरे प्रकरण में जिस एक बात पर चर्चा बिल्कुल नहीं हो रही है वह यह कि किंगफिशर के राजा के रंक हो जाने की कहानी क्या है? करीब साठ हजार करोड़ की बाजार पूंजीवाले यूबी समूह की यह एयरलाइन्स कंपनी इतनी कंगाल कैसे हो गई कि व्यापार बढ़ाने में विश्वास करनेवाले विजय माल्या किंगफिशर समेटने में जुट गये हैं. कर्जखोरी के किंगफिर काण्ड पर विजय भाटिया का विश्लेषण-
सरकार को सद्बुद्धि आई और उसने प्रत्यक्ष तौर पर गरीब के धन से अमीर को उबारने का जिम्मा उठाने से मना कर दिया. सरकार की इस मनाही के बाद किंगफिशर और किंगफिशर के किंग विजय माल्या दोनों ही डांवाडोल हालत में जा पहुंचे हैं. लेकिन वे सरकार की मनाही के बाद इस डांवाडोल अवस्था में आये हों ऐसा नहीं है. वित्त जगत पर नजर रखनेवाले लोग जानते हैं कि कंपनी लंबे समय से इसी तरह डांवाडोल हालत में है. यह कंपनी महीनों से दिवालिया होने की हालत में है. न उसके पैरों में अपने बूते खड़े रहने की ताकत है और न ही पंख पसारकर हवा में उड़ने की कूबत. इसलिए आज की छंटनी, मरनी करनी का आखिरी परिणाम होगा कि आखिरकार किंगफिशर को दिवालिया करार दे दिया जाएगा. यूबी समूह के लिए किंगफिशर का दिवालिया होना भले ही दिवाली जैसा हो लेकिन अगर कंपनी दिवालिया करार दी जाती है तो वे दिवालिया जरूर हो जाएंगे जिन्होंने माल्या के भरोसे पर किंगफिशर में पैसा झोंक रखा है.
2005 में शुरू की गई किंगफिशर एयरलाइन्स कंपनी की आज बाजार में कीमत 1250 करोड़ रूपया है. (शेयर बाजार के हिसाब से इसमें उतार चढ़ाव हो सकता है.) इस 1250 करोड़ की किंगफिशर कंपनी में मालिक विजय माल्या की हिस्सेदारी है 58 प्रतिशत. अगर किंगफिशर के डैने (पंख) समेट लिये जाते हैं तो हमारे माननीय सांसद विजय माल्या कोई 730 करोड़ रूपये का निवेश गंवा देंगे, लेकिन नुकसान उन्हीं का अकेले नहीं होगा. कई और हैं जिनका बंटाढार हो जाएगा.
पहला नंबर आयेगा उन वाणिज्यिक बैंकों का जिन्होंने माल्या के किंगफिशर में पैसा लगा रखा है. इसमें सबसे आगे हमारा स्टेट बैंक आफ इंडिया जिसने कुछ समय पहले घनघोर बेवकूफी में इस कंपनी के बकाया कर्ज को माफ कर उसे कंपनी में 23 प्रतिशत की हिस्सेदारी में बदल दिया था. इसका मतलब यह हुआ कि कर्ज के बल पर खड़ा किया गया किंगफिशर अगर डूबता है तो सीधे सीधे स्टेट बैंक आफ इंडिया के 291 करोड़ रूपये डूब जाएंगे.
दूसरे नंबर पर फिर होंगे वाणिज्यिक बैंक जिसमें फिर आगे होगा स्टेट बैंक आफ इंडिया. क्योंकि इस हवाई कंपनी के खाते इन्हीं वाणिज्यिक बैंकों में हैं. आखिरी गिनती के समय कंपनी पर कोई 7000 करोड़ के कर्जे बकाया थे. कर्जों पर लदा ब्याज बढ़ रहा है इसलिए ये कर्जे हर दिन बढ़ रहे हैं. कंपनी को दिवालिया घोषित करने और उसके कर्जों को खत्म करने की नौबत आते आते यह कर्जा 8,000 करोड़ तक पहुंच सकता है. लेकिन दिवालिया होने की दिवाली जिस दिन मनाई जाएगी उस दिन बैंक कुर्की करने के लिए दौड़ेगे. अपनी पूंजी को दोबारा पाने का यही उनके पास आखिरी हथियार होता है. लेकिन जब बैंक कुर्की करने के लिए दौड़ेगे तो उनके हाथ में कुछ नहीं आयेगा. उन्हें कोई संपत्ति नहीं मिलेगी. कारण? इस कंपनी ने कोई हवाई जहाज खरीदा ही नहीं. कंपनी के पास जो कुल 16 जहाज हैं वे किराये के हैं, बाकी उसने लंबे चौड़े जहाजों का आर्डर जरूर कर रखा है. जब बैंक कुर्की करने जाएंगे तो किराये के ये जहाज उन्हीं के मत्थे पड़ सकते हैं क्योंकि तब उन्हें यह भी देखना होगा कि इन जहाजों का किराया चुकाया गया है या नहीं.
तीसरे स्थान पर आयेंगी सरकारी तेल कंपनियां जैसे इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम जो इस एयरलाइन्स को ईंधन बेंचती हैं. व्यापार में उधार पर खरीदना और देर से चुकता करना यह सब तो चलता ही रहता है. पर इस मामले में यह उधारी छोटी मोटी नहीं है. पूरी उधारी करीब एक हजार करोड़ के आस पास है इसलिए तेल में आग लग जाए तो कहा नहीं जा सकता.
चौथे स्थान पर है भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और उसके साझीदार जैसे मुंबई और दिल्ली के निजी प्रबंधन में काम करनेवाले हवाई अड्डे. ऐसा माना जाता है कि इस कंपनी को इन हवाई अड्डों पर जहाज उतारने, खड़ा करने, सवारियों का चढ़ाने उतारने और जहाज को उड़ाने की सुविधाओं, सेवाओं के लिए जो पैसा देना था वह किंगफिशर के खाते में बकाया है. यही कोई 250 करोड़ रूपये.
किंगफिशर के दिवालिया होने की हालत में आयकर विभाग और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को 422 करोड़ रूपये की चपत लगेगी. कंपनी ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह में से यह सब पहले ही काट लिया है लेकिन न तो उसने सरकार को दिया है और न ही कर्मचारियों के कोटे में भविष्य निधि में जमा किया है.
किंगफिशर के दिवालिया होने की हालत में छठे नंबर पर चोट खायेंगे वे यात्री जो अब तक के क्लास का मजा ले रहे थे. जो के क्लब के सदस्य हैं या फिर लंबी अवधि की बुकिंग कराये बैठे हैं उनके पैसे डूब जाएंगे. अगर अनुमान के लिए एक तिहाई ग्राहकों का आकड़ा ही लें तो किंगफिशर के पास करीब 2000 करोड़ रूपये जमा होने चाहिए.
सातवें और आखिरी नंबर पर आते हैं वे 7000 हजार कर्मचारी जिनमें से आधे को अलविदा कहने की खबरें आने लगी हैं. इन सात हजार कर्मचारियों का भविष्य आगे क्या होगा यह न तो उन्हें पता है और न ही उनके किंग विजय माल्या को. इन कर्मचारियों को करीब साठ करोड़ की चपत लगेगी जिसमें उनकी ग्रेच्युटी, छोटे मोटे भत्ते और छुट्टियों की कमाई शामिल नहीं है.
खुदा न करे, कल को किंगफिशर अपने आपको दिवालिया करार दे दे तो किंगफिशर के किंग जरूर अपना 730 करोड़ रूपये का निवेश गंवा देंगे लेकिन हमारे आप जैसे आम आदमी को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी 11,000 करोड़ रूपये. कर्जखोरी से व्यापार खड़ा करने और उसे निजी मुनाफे के साथ दिवालिया करार करवा देने का यह खेल थोड़ा अजीब है जो आसानी से समझ में नहीं आता है. कहने के लिए तो मालिक के 730 करोड़ भी डूब रहे हैं लेकिन कर्ज की कीमत पर खड़ी की गई ऐसी कंपनियों में मालिकाना हक भी मुफ्त का ही होता है. इसलिए उनके हर एक रूपये के नुकसान पर हमारे 15 रूपये मिट जाएंगे. पता नहीं सरकार और किंगफिशर के बीच क्या बातचीत चल रही है लेकिन किंगफिशर के किंग सरकार को यह तो कह ही सकते हैं कि आप मेरी एयरलाइन्स को डुबोना चाहें तो डुबो दें पर जितने गहरे गड्ढे में मैं गिरूंगा उससे गहरी खाई में आप चले जाएंगे.
कर्जखोर किंग के ऐसा सोचने का कारण है. वित्त और वाणिज्य की दुनिया में यह कहा जाता है कि अगर बैंक का आपके ऊपर 10 हजार रूपये का कर्ज है तो यह आपकी समस्या है लेकिन अगर यह कर्ज 10 हजार करोड़ है तो फिर समस्या आपकी नहीं बल्कि बैंक और वित्तीय संस्थान की है. उद्योगपति और व्यापारी इसे अच्छी तरह जानते हैं. उन्हें यह बात बखूबी पता है कि एक रूपये का निवेश दिखाकर दस रूपये का कर्ज कैसे लिया जाता है. किंगफिशर ने भी यही खेल किया है और साठ हजार करोड़ की सशक्त बाजार पूंजीवाले यूबी समूह में शामिल होते हुए भी दिलालिये होने के रास्ते पर आराम से आगे बढ़ गई है.
(विजय भाटिया स्टैण्डर्ड चार्टर्ड बैंक में काम कर चुके हैं. वित्त जगत की धोखाधड़ी से ऊबकर अब कुछ नहीं करते सिर्फ जिंदगी जीने की कला सीख रहे हैं और बच्चों को सिखा रहे हैं.)

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