कामदेव के कलियुगी अवतार: कृपालु महाराज
जरा सोचिए, क्या किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति ब्यभिचारी-बलात्कारी मानसिकता के बीच सम्भव है? विशुद्ध रूप से आध्यात्म के रास्ते पर चलकर क्या करोड़ों-अरबों रूपयों की अचल सम्पत्तियों का अम्बार लगा देना संभव है ? अपने मूल नाम के साथ दस उपमाएँ लगाकर आज तक क्या कोई योग्य बन सका है? अपने को श्रीकृष्ण का अवतार बताकर किसी के साथ बलात्कार करना क्या किसी धर्मात्मा का कार्य हो सकता है? पुत्री समान अपनें ही शिष्याओं के साथ बलात्कार करने वाला बहुरूपिया कपटी संत क्या पूजनीय हो सकता है?
उक्त सभी प्रश्न ऐसे ‘यक्ष प्रश्न’ हैं जिनका जबाब सर्वथा ‘ना’ में ही निकलता है। इसी तरह से और न जाने कितने सवाल उस समय लोगों के मन - मस्तिष्क को झकझोर देते हैं, जब वे अदने से राम कृपालु त्रिपाठी से बनें स्वयं भू- वेदमार्ग प्रतिष्ठापनाचार्य, निखिल दर्शन समन्वयचार्य, भक्तियोग रसावतार, भगवदनन्त, श्री विभूषित जगतगुरु श्री 1008 जगतगुरु स्वामी कृपालु जी महाराज महाप्रभु के अतीत के काले पन्ने के साथ - साथ वर्तमान के गोरखधंधे को देखते हैं। जी हाँ, कुछ ऐसे ही कलियुगी धर्माचार्य हैं - राम कृपाल त्रिपाठी उर्फ कृपालु जी महाराज महाप्रभु जिन्होंने उपरोक्त सभी कु-कृत्यों को अंजाम देने के बाद आज भी धड़ल्ले के साथ धर्म की अपनी दुकानदारी चला रहे हैं।
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद के मनगढ़ कस्बे (गाँव) में 1922 में पैदा हुए राम कृपाल त्रिपाठी के विषय में तब किसी ने इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि आगे चलकर यही राम कृपाल त्रिपाठी न सिर्फ ‘बाबा बाजार’ में अपनी बुलंदी का परचम लहराएगा बल्कि सारे कु-कर्मों को सफलता पूर्वक अंजाम देते हुए अरबों रूपये की अचल सम्पतियों का मालिक भी बन बैठेगा। मनगढ़ (प्रतापगढ़) का वही राम कृपाल त्रिपाठी आज अपने आपको को ‘जगतगुरु कृपालु जी महाराज महाप्रभु’ इस दावे के साथ कहनें लगे हैं कि काशी विद्वत परिषद द्वारा उन्हें 14 जनवरी 1957 के सम्पूर्ण विश्व के पाचवें ‘मूल जगतगुरु’ की उपाधि से अलंकृत किया गया। इनका दावा है कि इनसे पूर्व केवल चार महापुरुषों को ही जगतगुरु की मूल उपाधि प्रदान की गई थी। लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व अद्वैतवाद जतगगुरु शंकराचार्य को, आठवीं-नवीं शताब्दी में द्वैतवादी जगतगुरु निम्बाकाचार्य को, 12 वीं शताब्दी में विशिष्ठाद्वैतवादी जगतगुरु रामानुजाचार्य को एवं लगभग 14 वीं शताब्दी में द्वैतवादी जगतगुरु माध्वाचार्य को। जबकि वर्तमान काल में खुद कृपालु जी महाराज पांचवें जगतगुरु हैं। अतएव ये पूर्ववर्ती चारो जगतगुरुओं के दार्शनिक सिद्धांत को सही सिद्ध करते हुए अपना समन्वयवादी सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे थे।
बहरहाल इस कथित बहुरुपिए धर्मात्मा ने अपनें छल-छदम के सहारे अचल सम्पत्तियों का जो सम्राज्य स्थापित कर लिया है वह किसी को भी दांतों तले अंगुली दबाने के लिए बाध्य कर देता है। प्रमाणतः मनगढ़ (प्रतापगढ़) में भक्ति धाम, रंगीली महल - बरसाना (मथुरा), बरसाना धाम - आस्टीन, टेक्सास (यू.एस.ए.) श्यामा श्याम धाम, बृन्दावन (मथुरा) जगतगुरु धाम - बृन्दावन (मथुरा), कृपालु इंटर कालेज - मनगढ़ (प्रतापगढ़), साधना भवन टूस्ट- मनगढ़ के अलावा मंसूरी (देहरादून), मुम्बई, काठमांडू एवं नैनीताल आदि प्रमुख हैं। राम कृपाल त्रिपाठी का चोला छोड़ कृपालु महाराज महाप्रभु का बाना धारण करते ही यह कथित धर्मात्मा जहाँ देखते ही देखते अरबों की अचल सम्पत्तियों का मालिक बन बैठा वही इनकी रंगीन मिजाजी एवं अय्यासी की खबरें भी अन्दर से छन-छनकर बाहर आती रही है। यानी कि शब्दों के फरेब एवं बहुरुपिएपन से जैसे-जैसे धनवर्षा होती गई वैसे-वैसे इनकी रंगीन मिजाजी एवं शाही ठाठ-बाट के चर्चे भी आम होते गये।
इस कलियुगी जगतगुरु कृपालु जी महाराज महाप्रभु के रंगीन मिजाजी एवं अय्यास तबीयत के बारे में पूरे मथुरा - बृन्दावन से लेकर बरसाना तक जिस तरह के चर्चाएं आम हैं वह साधु समाज ही नहीं बल्कि किसी भी सभ्य कहे जाने वाले समाज को शर्मसार कर देने के लिए पर्याप्त है। प्राप्त जानकारी एवं जन चर्चाओं के अनुसार, यह कलियुगी जगतगुरु कृपालु जी महाराज कितने अय्यास तबीयत के महाराज हैं इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि - इनके बरसाना स्थित रंगीली महल में किसी भी पुरुष का प्रवेश अधिकांशतः वर्जित है। यहाँ केवल महलाओं प्रवेश मिलता है। वह भी आम महिला नहीं बल्कि जो महिला देखने-सुनने लायक हो। कहा जाता है कि बरसाना के रंगीली महल में यह कथित धर्मात्मा जितनें दिन प्रवास करता है उतने दिन वहाँ रहने वाली प्रिय शिष्याएँ जहाँ खुद को ‘राधा’ का स्वरूप मानने लगती हैं, वहीं यह कथित जगतगुरु अपनी शिष्याओं के बीच ‘कृष्ण कन्हैया’ की तरह से ‘रासलीला’ रचाया करता है।
रंगीली महल में प्रवास के दौरान प्रातः सो कर उठने के समय से इस कलियुगी संत की दिन चर्चा जिस तरह शुरू होती है उसे देखकर सम्भवतः स्वयं ‘कामदेव महाराज’ भी पानी मांगने लगते होंगे। इस कलियुगी ‘श्री कृष्ण’ को साते से जागने के लिए इनकी प्रिय कलियुगी ‘राधा’ शिष्यायें किस तरह का उपक्रम कर इन्हें न सिर्फ जगाती हैं बल्कि, अपने इस ‘किशन कन्हैया’ का बलैया ले-लेकर तैयार करती है काबिले गौर है। इनके उठने से पहले इनकी कुछ चुनिन्दा शिष्याएँ इनके बदन को सहलाते हुए समवेत स्वर में गाती हैं. जागो मोहन प्यारे जागो। तब कहीं जाकर ये महाशय मुस्कुराते हुए नींद से जगते हैं। सो कर उठनें के बाद यह कथित धर्माचार्य अपने कंचन कामनीय शिष्याओं के कोमल हथेलियों पर चलकर अपने फाइवस्टार शौचालय तक जाते हैं तथा उसी क्रम में शौचालय से लौटते भी हैं।
बताया जाता है कि इनके स्नान करने से पहले इनकी आज की ‘आधुनिक राधाएँ’ हल्दी, चन्दन, गुलाब एवं केशर का इनको न सिर्फ उबटन लगाती हैं बल्कि, इत्र, गुलाब-जल से नहला-धुलाकर प्रतिदिन नया वस्त्र धारण कराती हैं। नहा-धोकर अब पूरी तरह से तैयार हो होंने के बाद अब शुरू होता है इस बहुरुपिए धर्माचार्य के घिनौने मानसिकता का नंगा नाच, मुंह में पान का बीड़ा डालकर शिष्याएँ इन्हें झूले पर झूलते-झूलते यह ‘मानसिक रोगी संत’ कभी अपने बायें तो कभी अपनें दायें पान की ‘पीक’ थूक दिया करता है जिसको अपने इस कलियुगी श्रीकृष्ण का ‘प्रसाद’ समझकर चाटने के लिए शिष्याएँ एक-दूसरे पर भूखे भेड़िये की तरह से टूट पड़ती है। इस क्रम में अक्सर कोई न कोई शिष्या घायल भी हो जाया करती हैं और यह मानसिक रोगी कथित धर्माचार्य कहकहे लगाया करता है।
(बलात्कारी भी हैं कृपालु महाराज: अगली कड़ी में.)



