Monday, March 15, 2010

कामदेव के कलियुगी अवतार: कृपालु महाराज

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जरा सोचिए, क्या किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति ब्यभिचारी-बलात्कारी मानसिकता के बीच सम्भव है? विशुद्ध रूप से आध्यात्म के रास्ते पर चलकर क्या करोड़ों-अरबों रूपयों की अचल सम्पत्तियों का अम्बार लगा देना संभव है ? अपने मूल नाम के साथ दस उपमाएँ लगाकर आज तक क्या कोई योग्य बन सका है? अपने को श्रीकृष्ण का अवतार बताकर किसी के साथ बलात्कार करना क्या किसी धर्मात्मा का कार्य हो सकता है? पुत्री समान अपनें ही शिष्याओं के साथ बलात्कार करने वाला बहुरूपिया कपटी संत क्या पूजनीय हो सकता है?

उक्त सभी प्रश्न ऐसे ‘यक्ष प्रश्न’ हैं जिनका जबाब सर्वथा ‘ना’ में ही निकलता है। इसी तरह से और न जाने कितने सवाल उस समय लोगों के मन - मस्तिष्क को झकझोर देते हैं, जब वे अदने से राम कृपालु त्रिपाठी से बनें स्वयं भू- वेदमार्ग प्रतिष्ठापनाचार्य, निखिल दर्शन समन्वयचार्य, भक्तियोग रसावतार, भगवदनन्त, श्री विभूषित जगतगुरु श्री 1008 जगतगुरु स्वामी कृपालु जी महाराज महाप्रभु के अतीत के काले पन्ने के साथ - साथ वर्तमान के गोरखधंधे को देखते हैं। जी हाँ, कुछ ऐसे ही कलियुगी धर्माचार्य हैं - राम कृपाल त्रिपाठी उर्फ कृपालु जी महाराज महाप्रभु जिन्होंने उपरोक्त सभी कु-कृत्यों को अंजाम देने के बाद आज भी धड़ल्ले के साथ धर्म की अपनी दुकानदारी चला रहे हैं।

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद के मनगढ़ कस्बे (गाँव) में 1922 में पैदा हुए राम कृपाल त्रिपाठी के विषय में तब किसी ने इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि आगे चलकर यही राम कृपाल त्रिपाठी न सिर्फ ‘बाबा बाजार’ में अपनी बुलंदी का परचम लहराएगा बल्कि सारे कु-कर्मों को सफलता पूर्वक अंजाम देते हुए अरबों रूपये की अचल सम्पतियों का मालिक भी बन बैठेगा। मनगढ़ (प्रतापगढ़) का वही राम कृपाल त्रिपाठी आज अपने आपको को ‘जगतगुरु कृपालु जी महाराज महाप्रभु’ इस दावे के साथ कहनें लगे हैं कि काशी विद्वत परिषद द्वारा उन्हें 14 जनवरी 1957 के सम्पूर्ण विश्व के पाचवें ‘मूल जगतगुरु’ की उपाधि से अलंकृत किया गया। इनका दावा है कि इनसे पूर्व केवल चार महापुरुषों को ही जगतगुरु की मूल उपाधि प्रदान की गई थी। लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व अद्वैतवाद जतगगुरु शंकराचार्य को, आठवीं-नवीं शताब्दी में द्वैतवादी जगतगुरु निम्बाकाचार्य को, 12 वीं शताब्दी में विशिष्ठाद्वैतवादी जगतगुरु रामानुजाचार्य को एवं लगभग 14 वीं शताब्दी में द्वैतवादी जगतगुरु माध्वाचार्य को। जबकि वर्तमान काल में खुद कृपालु जी महाराज पांचवें जगतगुरु हैं। अतएव ये पूर्ववर्ती चारो जगतगुरुओं के दार्शनिक सिद्धांत को सही सिद्ध करते हुए अपना समन्वयवादी सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे थे।

बहरहाल इस कथित बहुरुपिए धर्मात्मा ने अपनें छल-छदम के सहारे अचल सम्पत्तियों का जो सम्राज्य स्थापित कर लिया है वह किसी को भी दांतों तले अंगुली दबाने के लिए बाध्य कर देता है। प्रमाणतः मनगढ़ (प्रतापगढ़) में भक्ति धाम, रंगीली महल - बरसाना (मथुरा), बरसाना धाम - आस्टीन, टेक्सास (यू.एस.ए.) श्यामा श्याम धाम, बृन्दावन (मथुरा) जगतगुरु धाम - बृन्दावन (मथुरा), कृपालु इंटर कालेज - मनगढ़ (प्रतापगढ़), साधना भवन टूस्ट- मनगढ़ के अलावा मंसूरी (देहरादून), मुम्बई, काठमांडू एवं नैनीताल आदि प्रमुख हैं। राम कृपाल त्रिपाठी का चोला छोड़ कृपालु महाराज महाप्रभु का बाना धारण करते ही यह कथित धर्मात्मा जहाँ देखते ही देखते अरबों की अचल सम्पत्तियों का मालिक बन बैठा वही इनकी रंगीन मिजाजी एवं अय्यासी की खबरें भी अन्दर से छन-छनकर बाहर आती रही है। यानी कि शब्दों के फरेब एवं बहुरुपिएपन से जैसे-जैसे धनवर्षा होती गई वैसे-वैसे इनकी रंगीन मिजाजी एवं शाही ठाठ-बाट के चर्चे भी आम होते गये।

इस कलियुगी जगतगुरु कृपालु जी महाराज महाप्रभु के रंगीन मिजाजी एवं अय्यास तबीयत के बारे में पूरे मथुरा - बृन्दावन से लेकर बरसाना तक जिस तरह के चर्चाएं आम हैं वह साधु समाज ही नहीं बल्कि किसी भी सभ्य कहे जाने वाले समाज को शर्मसार कर देने के लिए पर्याप्त है। प्राप्त जानकारी एवं जन चर्चाओं के अनुसार, यह कलियुगी जगतगुरु कृपालु जी महाराज कितने अय्यास तबीयत के महाराज हैं इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि - इनके बरसाना स्थित रंगीली महल में किसी भी पुरुष का प्रवेश अधिकांशतः वर्जित है। यहाँ केवल महलाओं प्रवेश मिलता है। वह भी आम महिला नहीं बल्कि जो महिला देखने-सुनने लायक हो। कहा जाता है कि बरसाना के रंगीली महल में यह कथित धर्मात्मा जितनें दिन प्रवास करता है उतने दिन वहाँ रहने वाली प्रिय शिष्याएँ जहाँ खुद को ‘राधा’ का स्वरूप मानने लगती हैं, वहीं यह कथित जगतगुरु अपनी शिष्याओं के बीच ‘कृष्ण कन्हैया’ की तरह से ‘रासलीला’ रचाया करता है।

रंगीली महल में प्रवास के दौरान प्रातः सो कर उठने के समय से इस कलियुगी संत की दिन चर्चा जिस तरह शुरू होती है उसे देखकर सम्भवतः स्वयं ‘कामदेव महाराज’ भी पानी मांगने लगते होंगे। इस कलियुगी ‘श्री कृष्ण’ को साते से जागने के लिए इनकी प्रिय कलियुगी ‘राधा’ शिष्यायें किस तरह का उपक्रम कर इन्हें न सिर्फ जगाती हैं बल्कि, अपने इस ‘किशन कन्हैया’ का बलैया ले-लेकर तैयार करती है काबिले गौर है। इनके उठने से पहले इनकी कुछ चुनिन्दा शिष्याएँ इनके बदन को सहलाते हुए समवेत स्वर में गाती हैं. जागो मोहन प्यारे जागो। तब कहीं जाकर ये महाशय मुस्कुराते हुए नींद से जगते हैं। सो कर उठनें के बाद यह कथित धर्माचार्य अपने कंचन कामनीय शिष्याओं के कोमल हथेलियों पर चलकर अपने फाइवस्टार शौचालय तक जाते हैं तथा उसी क्रम में शौचालय से लौटते भी हैं।

बताया जाता है कि इनके स्नान करने से पहले इनकी आज की ‘आधुनिक राधाएँ’ हल्दी, चन्दन, गुलाब एवं केशर का इनको न सिर्फ उबटन लगाती हैं बल्कि, इत्र, गुलाब-जल से नहला-धुलाकर प्रतिदिन नया वस्त्र धारण कराती हैं। नहा-धोकर अब पूरी तरह से तैयार हो होंने के बाद अब शुरू होता है इस बहुरुपिए धर्माचार्य के घिनौने मानसिकता का नंगा नाच, मुंह में पान का बीड़ा डालकर शिष्याएँ इन्हें झूले पर झूलते-झूलते यह ‘मानसिक रोगी संत’ कभी अपने बायें तो कभी अपनें दायें पान की ‘पीक’ थूक दिया करता है जिसको अपने इस कलियुगी श्रीकृष्ण का ‘प्रसाद’ समझकर चाटने के लिए शिष्याएँ एक-दूसरे पर भूखे भेड़िये की तरह से टूट पड़ती है। इस क्रम में अक्सर कोई न कोई शिष्या घायल भी हो जाया करती हैं और यह मानसिक रोगी कथित धर्माचार्य कहकहे लगाया करता है।

(बलात्कारी भी हैं कृपालु महाराज: अगली कड़ी में.)

Thursday, March 11, 2010

सऊदी, सईद और इस्लामी आतंकवाद

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एक ओर तो भारतीय प्रधानमंत्री सऊदी अरब से मधुर रिश्ते स्थापित करने की गऱज़ से सऊदी अरब जा रहे हैं तथा अरब का शाही परिवार उनका अभूतपूर्व स्वागत कर रहा है और दोस्ती की राह पर आगे बढ़ने का संदेश दे रहा है तो दूसरी ओर यही सऊदी अरब पाकिस्तान में जमात-उद- दावा सहित ऐसे कई संगठनों की आर्थिक सहायता भी कर रहा है जोकि भारत के विरुद्ध आतंकवादी गतिविधियों में सक्रिय हैं।

वहाबी विचारधारा जोकि इस समय पूरी दुनिया के लिए इस्लामी आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रेरक बन चुकी है उसकी जड़ें दुनिया में और कहीं नहीं बल्कि सऊदी अरब में ही हैं। अर्थात यदि वहाबी विचारधारा अतिवादी इस्लाम के रास्ते पर चलना सिखाती है तो अतिवादी इस्लाम ही जेहाद शब्द को अपने तरीक़े से परिभाषित करते हुए इसे सीधे आतंकवाद से जोड़ देता है। 18वीं शताब्दी में सऊदी अरब के एक अतिवादी विचार रखने वाले मुस्लिम विद्वान मोहम्मद इब्रे अब्दुल वहाब द्वारा इस्लाम को कट्टरपंथी रूप देने का यह अतिवादी मिशन चलाया गया। उसने 'शुद्ध इस्लाम' के प्रचार व प्रसार पर बल दिया। जिसे वह स्वयं ज़रूरी समझता था उसे तो उसने इस्लामी कार्यकलाप बताया और जो कुछ उसकी नज़रों में उचित नहीं था उसे उसने गैर इस्लामी, बिदअत अथवा गैर शरई घोषित किया। मोहम्मद इब्रे अब्दुल वहाब का यह मत था कि मुस्लिम समाज के जो लोग गैर इस्लामी (उसके अनुसार)कार्यकलाप करते हैं वे भी काफिर हैं। अशिक्षित अरबों के मध्य वह जल्द ही काफी लोकप्रिय हो गया।

इस विचारधारा के विस्तार के समय अरब के मक्का व मदीना जैसे पवित्र शहरों में वहाबी समर्थकों ने बड़े पैमाने पर सशस्त्र उत्पात मचाया। परिणामस्वरूप मक्का व मदीना में बड़ी संख्या में निहत्थे मुस्लिम औरतों,बच्चों व बुज़ुर्गों का कत्लेआम हुआ। इन्हीं के द्वारा उस ऐतिहासिक मकान को भी ध्वस्त कर दिया गया जहां हज़रत मोहम्मद का जन्म हुआ था। इस विचारधारा के समर्थकों द्वारा अरब में स्थित तमाम सूफी दरगाहों तथा मज़ारों को भी नष्ट किया गया। आगे चलकर इसी विचारधारा ने सऊदी अरब की धरती पर ही जन्मे ओसामा बिन लाडेन जैसे मुसलमान को दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकवादी बनने के मार्ग पर पहुंचा दिया।

जब यही ओसामा बिन लाडेन दुनिया का मोस्ट वांटेड अपराधी बन जाता है तब यही सऊदी अरब की सरकार उसे देश निकाला देकर स्वयं को पुन: पाक-साफ, शांतिप्रिय तथा अविवादित स्थिति में ला खड़ा करती है। और तो और यदि उसे लाडेन या दुनिया के अन्य जेहादी अतिवादियों तथा आतंकवादियों के विरुद्ध कुछ कहना सुनना पड़े तो सऊदी अरब इससे भी नहीं हिचकिचाता। इस समय भारत-पाक रिश्तों में रोड़ा बनकर जो नाम सबसे आगे आ रहा है वह है पाकिस्तान स्थित जमाअत-उद-दावा के प्रमुख हाफिज मोहम्मद सईद का। हाफिज मोहम्मद सईद इस समय दुनिया का सबसे विवादित एवं मोस्ट वांटेड अपराधी बन चुका है। मुंबई में हुए 26-11 के हमले के योजनाकारों के रूप में उसका नाम सबसे ऊपर उभरकर सामने आया है। भारत में 26-11 के हमले के दौरान गिरफ्तार किए गए एकमात्र जीवित आतंकी अजमल आमिर कसाब ने ही हाफिज मोहम्मद सईद के 26-11 में शामिल होने की बात कही है। उसी ने पाकिस्तान के मुरीदके नामक आतंकी प्रशिक्षण कैंप से प्रशिक्षण प्राप्त करने की बात भी कुबूल की है। यह प्रशिक्षण केंद्र जमात-उद-दावा द्वारा संचालित है। नई दिल्ली में गत 25 फरवरी को भारत-पाक के मध्य हुई विदेश सचिव स्तर की बातचीत के दौरान भारत की ओर से पाकिस्तानी विदेश सचिव सलमान बशीर को जो तीन डोसियर सौंपे गए हैं उनमे हाफिज मोहम्मद सईद सहित 34 आतंकवादियों को भारत को सौंपने की मांग भी की गई थी। इस पर पाकिस्तान ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए यह साफ कर दिया है कि वह हाफिज सईद को भारत के हाथों कतई नहीं सौंपेगा।

पाकिस्तान व सऊदी अरब के मध्य कोई साधारण रिश्ते नहीं हैं बल्कि सऊदी अरब पाकिस्तान के प्रत्येक राजनैतिक उतार-चढ़ाव पर न केवल अपनी गहरी नज़र रखता है बल्कि पाकिस्तान पर अपना पूरा दखल भी रखता है।25 फरवरी को नई दिल्ली में हुई इस वार्ता के बाद हाफिज मोहम्मद सईद ने पाकिस्तान में एक टी वी चैनल को अपना साक्षात्कार दिया। इस साक्षात्कार में जहां उसने अन्य तमाम बातें कीं वहीं वह यह बताने से भी नहीं चूका कि उसकी सोच व फिक्र के पीछे सऊदी अरब में ग्रहण की गई उसकी शिक्षा का सबसे बड़ा योगदान है। संभवत: इसी अतिवादी शिक्षा के ही परिणामस्वरूप साक्षात्कार के दौरान उसने टी वी कैमरे के समक्ष अपना चेहरा रखने के बजाए कैमरे को अपनी पीठ की ओर करने का निर्देश दिया। पत्रकार द्वारा इसका कारण पूछे जाने पर उसने यही कहा कि फोटो खिंचवाना इस्लामी शरिया के लिहाज़ से जायज़ नहीं है। गौरतलब है कि हाफिज सईद इस्लामी शिक्षा का प्रोफेसर रह चुका है तथा शैक्षिक व्यस्तताएं छोड़कर अब जमात-उद- दावा संगठन गठित कर इसी के अंतर्गत तमाम स्कूल स्तर के मदरसे, जेहादी विचारधारा फैलाने वाली शिक्षा देने, अस्पताल चलाने तथा अन्य गैर सरकारी संगठन संचालित करने का काम कर रहा है। उसका स्वयं मानना है कि जमात के माध्यम से दुनिया के मुसलमानों को अपने साथ जोडऩा, उनका सुधार करना तथा इस्लामी शिक्षा का वैश्विक स्तर पर प्रचार व प्रसार करना उसके जीवन का मुख्य उद्देश्य है। हाफिज सईद स्वयं न केवल यह स्वीकार करता है बल्कि बड़े गर्व से यह बताता भी है कि धर्म के नाम पर चलने की सीख उसने सऊदी अरब में रहकर वहां के धर्माधिकारियों से ही हासिल की है।

गौऱतलब है कि 26-11 के बाद भारत द्वारा पाकिस्तान पर अत्यधिक दबाव डालने के बाद पाकिस्तान द्वारा हाफिज सईद को नज़रबंद कर दिया गया था। उस समय सऊदी अरब से अब्दुल सलाम नामक मध्यस्थताकार पाकिस्तान आए थे जिन्होंने हाफिज सईद व पाक सरकार के मध्य समझौता कराने में अहम भूमिका अदा की थी। आज यह घटना क्या हमें यह सोचने के लिए मजबूर नहीं करती कि आखिर हाफिज सईद के प्रति सऊदी अरब की इस हमदर्दी की वजह क्या थी? इसी समझौते के बाद न सिर्फ हाफिज सईद की नज़रबंदी हटाई गई बल्कि उसके बाद से ही उसने पाकिस्तान के प्रमुख शहरों में जनसभाओं व रैलियों के माध्यम से भारत के विरुद्ध जेहाद छेडऩे जैसा नापाक मिशन भी सार्वजनिक रूप से चलाना शुरु कर दिया। इसी सिलसिले में एक बात और याद दिलाता चलूं कि पाकिस्तान में इस्लाम को अतिवादी रूप देने के जनक समझे जाने वाले फौजी तानाशाह जनरल जिय़ा उल हक के सिर पर भी सऊदी अरब की पूरी छत्रछाया थी। एक और घटना का उल्लेख करना यहां प्रासंगिक होगा। जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने जब नवाज़ शरीफ की सरकार का तख्ता पलटा तथा उन्हें जेल में डाल दिया उस समय भी सऊदी अरब ने मध्यस्थता कर नवाज़ शरीफ को जनरल परवेज़ मुशर्रफ के प्रकोप से बचाने में उनकी पूरी मदद की थी तथा शरीफ को सऊदी अरब बुला लिया गया था।

लश्करे तैयबा जोकि पाकिस्तान स्थित सबसे खूंखार आतंकी संगठन है तथा जिस पर 26 फरवरी को काबुल में हुए भारतीयों पर हमले करने का भी ताज़ातरीन आरोप है उस संगठन के प्रति हाफिज सईद ने अपनी पूरी हमदर्दी का इज़हार भी किया है। उसने अपने साक्षात्कार में साफतौर पर यह बात कही है कि वह न केवल लश्करे तैयबा के साथ है बल्कि प्रत्येक उस संगठन के साथ है जो कश्मीर की स्वतंत्रता के लिए जेहाद कर रहे हैं। जेहाद को भी हाफिज सईद अपने ही तरीक़े से परिभाषित करते हुए यह कहता है कि किसी ज़ालिम से स्वयं को बचाने हेतु की जाने वाली जद्दोजहद को ही जेहाद कहते हैं। उसके अनुसार वह कश्मीरी मुसलमानों को भारतीय सेना से बचाने हेतु जो प्रयास कर रहा है वही जेहाद है।

सऊदी अरब से अतिवादी शिक्षा प्राप्त करने वाला यह मोस्ट वांटेड अपराधी कश्मीर में सशस्त्र युद्ध को भी सही ठहराता है तथा इसमें शामिल लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देता है। वह संसद पर हुए हमले तथा 26-11 के मुंबई हमलों में अपनी संलिप्तता होने से तो इंकार करता है परंतु जब उससे यह पूछा गया कि सार्वजनिक रूप से आपके यह कहने का क्या अभिप्राय है कि 'एक मुंबई काफी नहीं'। इसके जवाब में हाफिज सईद के पास बग़लें झांकने के सिवा कुछ नहीं था। वह भारत द्वारा सौंपे गए डोसियर को भी अपने विरुद्ध प्रमाण नहीं बल्कि साहित्य बताता है। उसने साफ तौर पर पाक सरकार को यह भी कहा है कि वह भारत के विरुद्ध जेहाद का एलान कर जंग की घोषणा करे अन्यथा पाक स्थित धर्मगुरु भारत के विरुद्ध जेहाद घोषित करने के बारे में स्वयं फैसला लेंगे। उसका कहना है पाकिस्तान का बच्चा-बच्चा तथा जमात-उद- दावा के सदस्य पाकिस्तान के साथ भारत के विरुद्ध लडऩे को तैयार हैं।

(तनवीर जाफरी हरियाणा साहित्य अकादमी के सदस्य हैं. tanveerjafri1@gmail.com)

एयरटेल की टेल उखाड़ दें

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मुंबई। अभी सुप्रीम कोर्ट ने कल ही बड़े सुसंस्कृत शब्दों में राज ठाकरे से कहा था कि आपको शिष्ट भाषा का प्रयोग करना चाहिए. राज ठाकरे ने सुप्रीम कोर्ट का पूरा मान रखते हुए आज हिन्दी विरोधी नारा फिर बुलंद कर दिया और गाज गिराई एक निजी मोबाईल कंपनी एयरटेल पर.

मामला यह कि एयरटेल कंपनी का वाइस रिस्पांस सिस्टम अभी मराठी को सपोर्ट नहीं करता. इसी बात पर नाराज राज ने मनसे उग्रवादियों को निर्देश दिया कि एयरटेल की 'टेल' उखाड़ दें। इसके तुरंत बाद खबर आई कि एमएनएस कार्यकर्ताओं ने ठाणे में इस कंपनी के एक शोरूम पर हमला किया। हालांकि पुलिस ने कहा कि ऐसा कोई हमला नहीं हुआ है।

राज ने इस बात पर नाराजगी जताई कि यह कंपनी इंटरैक्टिव वॉइस रेस्पॉन्स (आईवीआर) तकनीकी कारणों का हवाला देकर मराठी में शुरू नहीं कर रही है। मटुंगा के यशवंत नाट्यगृह में अपनी पार्टी के चौथे स्थापना दिवस समारोह में उन्होंने कहा कि अब आप (एमएनएस कार्यकर्ता) एयरटेल की 'टेल' उखाड़ दें। इस बीच सूत्रों ने कहा कि इस कंपनी ने राज को चिट्ठी भेजकर कहा है कि वह मराठी में आईवीआर शुरू करेगी।

राज ने कहा कि मैं हिंदी के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन हमारे ऊपर हिंदी थोपिए मत। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उनसे कहा था कि उत्तर भारतीयों को निशाना बनाकर भड़काऊ भाषण नहीं दें। राज ने एमएनएस कार्यकर्ताओं से यह सुनिश्चित करवाने को कहा कि रेलवे स्टेशनों और एयरपोर्ट्स पर अनाउंसमेंट मराठी में हों।

राज ने कहा कि एमएनएस महिला आरक्षण बिल का पूरा समर्थन करती है। उन्होंने बिल के विरोधी लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव का मजाक उड़ाते हुए कहा कि इस विरोध से पता चलता है कि उनकी संस्कृति कैसी है।

कांग्रेस से बर्खास्त हुए साधु यादव

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नई दिल्ली। कांग्रेस ने साधु यादव को नोटिस देते हुए पार्टी से बर्खास्त कर दिया है. हालांकि नोटिस में साधु यादव द्वारा महिला आरक्षण विधेयक पर उनके रवैये को कारण बताया गया है लेकिन हकीकत यह है कि दोनों के संबंध तल्ख हो चुके थे और कांग्रेस भी साधु यादव को दरवाजा दिखाने का बहाना खोज रही थी.

साधु यादव पहले ही संकेत दे चुके थे कि वे अपने जीजी के घर वापस जाएंगे. इस संबंध में विस्फोट ने पहले ही खबर प्रकाशित की थी साधु यादव लालू के पास वापस लौटने की कोशिश कर रहे हैं. लालू भी चाहते थे कि साधु यादव वापस लौट आये. महिला आरक्षण विधेयक पर साधु यादव को मौका दे दिया और कांग्रेस के सांसद की बजाय राज्यसभा में उन्होंने अपने जीजा लालू यादव और भाई सुभाष यादव का साथ दिया. asardar_213871539_241766726.gif

साधु यादव के इस रवैये से खिन्न कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. हालांकि खबर यह भी है कि कांग्रेस में साधु यादव सुप्रीमो बनने का ख्वाब लेकर आये थे लेकिन उनका ख्वाब पूरा होता दिखाई नहीं दिया. इसलिए उन्होंने महिला आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस का साथ देने की बजाय लालू यादव और अपनी पुरानी पार्टी का साथ देना ज्यादा जरूरी समझा. हालांकि खुद साधु यादव निलंबन की खबरों का खण्डन करते हुए कहा है कि उनका कांग्रेस से कोई निलंबन नहीं हुआ है. वे कांग्रेस में थे और कांग्रेस में ही रहेंगे.

बुढ़ापे में बाल ठाकरे का बहू से सामना

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image स्मिता ठाकरे के साथ बाल ठाकरे

शिवसेना प्रमुख का बुढापा खराब हो रहा है। या यूं भी कहा जा सकता है कि वे खुद ही अपना बुढ़ापा खराब करवा रहे हैं। अकसर किसी भी वृद्ध के लिए किसी के भी मन में सम्मान ही होता है। और इस उमर की सबसे बड़ी जरूरत भी सम्मान ही हुआ करती है। हर बूढ़ा इंसान चाहता है कि कोई भी उसके विरोध में ना बोले। खासकर घर के लोग इतना तो खयाल करे, ताकि इस उमर में उसके मान सम्मान की रक्षा होती रहे। पर, बाल ठाकरे के साथ उल्टा हो रहा है।

राजनीति में बाल ठाकरे के असल अवतार कहे जाने वाले भतीजे राज ठाकरे तो सामने तलवार लेकर खड़े ही है। अब बहू भी मैदान में उतर आई है। फिल्म "माई नेम इज खान" की रिलीज पर शिवसेना द्वारा खड़े किए गए बवाल के बीच स्मिता ठाकरे भी शाहरूख खान की पैरवी में मैदान में कूद पड़ी हैं।

ठाकरे परिवार की सबसे सक्रिय और लोकप्रिय बहू स्मिता ने खुलकर कहा है कि शाहरुख खान की फिल्म "माई नेम इज खान" के मामले में शिवसेना जो कुछ भी कर रही है, वह ठीक नहीं है। आज मुंबई में स्मिता ने शाहरूख खान का समर्थन करते हुए शिवसेना पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि शिवसेना द्वारा इस फिल्म का विरोध करना बिल्कुल गलत है। स्मिता ने इस तरह के विरोध को राजनीतिक सेंसरशिप का बताते हुए इसका विरोध किया है। और शाहरुख का समर्थन में यह भी कहा है कि कलाकार भी आखिर एक सामान्य इंसान है, जिसे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का हक है।

यह कोई बहुत दिन पुरानी बात नहीं है, जब शिवसेना में बहू स्मिता ठाकरे का फरमान चलता था। राज ठाकरे जब शिवसेना में ही थे, तब भी स्मिता की बहुत चलती थी। पार्टी में उनके रुतबे का इससे बड़ा सबूत और कुछ हो ही नहीं सकता कि शिवसेना में किसी की भी उनका नाम लेकर संबोधित करने की हिम्मत कभी नहीं देखी गई। सम्मान की यह आदत शिवसेना के कार्यकर्ताओं में आज भी मौजूद है। लोग सम्मान से उनको ‘भाभी’ कहते हैं। वजह यही थी कि स्मिता ठाकरे पर बाल ठाकरे की मेहरबानी थी और वे सबसे चहेती बहू इसलिए भी कही जाती है क्योंकि वयोवृद्ध होते ठाकरे की सेवा भी उन्हीं ने की।

पर, वक्त बदला और हालात भी बदल गए। तो पिछले दिनों सबके सामने स्मिता ठाकरे ने खुलकर कहा था कि अब मातोश्री में दम घुटने लगा है। तब लबको लग गया था कि भाभी अपने लिए नए दरवाजे खोल सकती हैं। और उसके तत्काल बाद ही जब स्मिता ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी की तारीफ की, तो तय हो गया कि उनका रास्ता किधर जा सकता है। लेकिन हर कोई मान रहा था कि स्मिता औरों की तारीफ तो कर सकती हैं। लेकिन यह कभी किसी ने भी नहीं सोचा था कि बाल ठाकरे का बेदह सम्मान करने वाली उनकी यह लाडली बहू कभी उनके किए और कहे को गलत ठहराकर विरोध में भी उतर सकती है। पर, अब बहू भी बाल ठाकरे मे सामने खड़ी हो गई है। शाहरुख खान के मामले मैं भाभी ने शिवसेना की कार्रवाई को ना केवल गलत ठहराया है बल्कि उसका विरोध भी किया है।

स्मिता ठाकरे शौक से समाजसेविका है और पेशे से फिल्म निर्माता। वे इंडियन मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष रह चुकी हैं और मुक्ति नामक एक एनजीओ भी चलाती हैं। पिछले दिनों मराठी फिल्म ‘झेंडा’ के खिलाफ जब महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री नारायण राणे के समर्थकों ने हंगामा किया था। और फिल्म में कुछ बदलाव के बाद ही उसको चलने दिया। तब स्मिता कुछ भी नहीं बोली थी। बिल्कुल चुप रहीं। राणे अब कांग्रेस में हैं। और शाहरुख भी कांग्रेस खेमे के ही माने जाते हैं। इससे स्मिता की नई राह को समझा जा सकता है। शाहरुख का समर्थन और वह भी ससुर ठाकरे के विरोध के साथ। स्मिता ने पहली बार अपने जीवन का सबसे मजबूत कदम बढ़ाया है। लेकिन फिर भी बाल ठाकरे का क्या? वे इस उमर में भी जो कुछ कर रहे हैं और जिस तरह के बयान देकर अपनी सेना से जो कुछ भी करवा रहे हैं, उसमें स्मिता ठाकरे जैसी उनकी सबसे लाडली बहू के पास भी उनका विरोध करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। बाल ठाकरे के लिए बुढ़ापे में इससे बुरी बात और क्या हो सकती है?

माई नेम इज बाल ठाकरे

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साल भर पहले की बात है. 26 फरवरी की देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में एक बीमार व्यक्ति को रुटीन चेक-अप के नाम पर अस्पताल लाया गया. डाक्टरों ने परीक्षण किया तो उस बीमार व्यक्ति को अस्पताल में दाखिल कर लिया क्योंकि उन्हें फेफड़े में संक्रमण था. संक्रमण सामान्य नहीं था. डाक्टरों ने लंबे समय तक आराम करने की सलाह दे दी.

घर परिवार के लोगों ने भी इसी सलाह को सही माना और शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे पूरी तरह से आराम की मुद्रा में चले गये. उनकी बीमारी जितना खुद बाल ठाकरे के लिए तकलीफदेह थी उससे अधिक उनकी पार्टी शिवसेना के लिए साबित होनेवाली थी. मार्च अप्रैल से ही राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो गयी थी और अक्टूबर में नयी सरकार के लिए मतदान होना था. मुश्किल तब भी न होती लेकिन बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे उनके विकल्प के तौर पर उभारे जा रहे थे. कांग्रेस और एनसीपी दोनों को राज ठाकरे के उभार से अच्छी खासी मदद मिल रही थी इसलिए परोक्ष रूप से राज ठाकरे को राजाश्रय मिला हुआ था. बाल ठाकरे को इतना तो अंदाज लग ही रहा था कि इसका खामियाजा आनेवाले चुनाव में शिवसेना को भुगतना पड़ेगा लेकिन वे लाचार थे. बीमारी सामान्य नहीं थी और 83 साल की उम्र में न तो वे खुद और न ही उनका परिवार कोई रिस्क ले सकता था. चुनाव हो गये. परिणाम आ गये और उद्धव की आशा के विपरीत शिवसेना चारों खाने चित्त गिर पड़ी.

अपने जीवन के अवसान काल में पड़े शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के लिए निश्चित रूप से यह अपनी निजी बीमारी से बड़े दुख की घड़ी रही होगी. लेकिन ऐसा लगता है यहीं से बूढ़े शेर ने न केवल अपने शरीर पर पड़ी धूल झाड़ दी बल्कि शिवसेना को भी झाड़ने पोछने का जिम्मा उठा लिया. जिन लोगों ने भी उद्धव ठाकरे की रणनीतिक कौशल का तर्क देकर महाराष्ट्र में शिवसेना की सत्ता में वापसी की आस बंधाई होगी, वे भी चुप हो गये और मानों बाल ठाकरे ने कहा- बेटा राजनीति कैसे की जाती है, अब हम तुम्हें बताते हैं. अक्टूबर के बाद से राज्य में भले ही कांग्रेस सत्ता में आ गयी हो लेकिन चर्चा में शिवसेना लौट आयी. इसके सीधे तौर पर दो परिणाम हुए. कांग्रेस का भ्रम टूटा कि शिवसेना बीते दिनों की बात है और राज ठाकरे नामक भस्मासुर को भस्म करना है. यह पुनीत पावन काम भी बाल ठाकरे ने ही करना शुरू कर दिया. पिछले एक महीने में मुंबई खबरों में बनी हुई है. लेकिन आश्चर्य देखिए न तो कोई राज ठाकरे का नाम ले रहा है और न ही उनकी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का. बाल ठाकरे ने अपनी राजनीतिक चालों से कांग्रेस और राज ठाकरे दोनों को ढेर कर दिया और हार के बावजूद शिवसेना को दोबारा चर्चा में स्थापित कर दिया. अब महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर कांग्रेस बनाम शिवसेना की हो गयी है जिसके बीच से मनसे, भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस तीनों ही गायब हो गये हैं.

शाहरुख खान के बहाने ही सही बाल ठाकरे ने माइ नेम इज खान पर माइ नेम इस ठाकरे को भारी साबित कर दिया. महाराष्ट्र की राजनीति में जो बाल ठाकरे को दगा हुआ कारतूस मान बैठे थे वे भी बाल ठाकरे की ताजा गतिविधियों से हैरान जरूर होंगे.

बाल ठाकरे बहुत चतुर राजनीतिज्ञ हैं ऐसी बात भी नहीं है. अगर आप उनकी राजनीतिक यात्रा देखें तो वे सीधे सपाट राजनीतिज्ञ नजर आते हैं और अपने कुछ पूर्वाग्रहों के साथ जीने में उन्हें मजा आता है. 1966 में शिवसेना की स्थापना के बाद से ही उन्होंने राजनीति में कूटनीति या चतुराई का प्रयोग नहीं किया. फिर भी महाराष्ट्र की राजनीति में वे कांग्रेस का विकल्प बनकर उभरे. फिर बाल ठाकरे ने ऐसा क्या किया कि महाराष्ट्र की राजनीति में वे सत्ता के इतर सत्तातंत्र के स्वामी बन गये? उन्होंने दम-खम की राजनीति की. जो सोचा, वही बोला और वही किया. अब जाहिर सी बात है कि अगर उनका सोचा उत्तर भारतीयों के खिलाफ था तो उत्तर भारतीय तो कभी उनके समर्थन में बात नहीं करेंगे. बाल ठाकरे के इस दम-खम वाली राजनीति को सामान्य बोलचाल की भाषा में गुण्डागर्दी की राजनीति में कहा जाने लगा लेकिन संभवत: बाल ठाकरे जानते थे कि वे राजनीति में किसे और क्यों संबोधित कर रहे हैं? शिवसेना ने जिस मराठी मानुष की भावना को अपनी राजनीति का आधार बनाया वह तत्व हर मराठी व्यक्ति में बहुत गहराई से निहित है. खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी आंतरिक व्यवस्था में मराठी श्रेष्ठताबोध से मुक्त नहीं है. इसलिए महाराष्ट्र में गैर मराठी का मुद्दा चल निकलना कहीं से अस्वाभाविक नहीं था. जिस दौर में बाल ठाकरे का उदय हो रहा था उसी दौर में उत्तर भारत के लोग बजाय कोलकाता जाने के, मुंबई की ओर रुख कर रहे थे क्योंकि कोलकाता में यूपी-बिहार से गये कामगारों को न काम मिल रहा था और न ही सम्मान. लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि जिस बंबई की ओर वे कूच कर रहे हैं वहां बंगाली बाबू से बड़ी मराठी माणुस की मानसिकता उनके लिए चुनौती बनकर खड़ी होगी. बाल ठाकरे ने इसे ही अपनी राजनीति का आधार बना लिया.

23 जनवरी 1926 को पूना में पैदा हुए बाल ठाकरे के पिता केशव ठाकरे एक पाक्षिक पत्रिका प्रकाशित करते थे जिसमें वे प्रबोधनकार के नाम से लिखते थे इसलिए उन्हें प्रबोधनकार ठाकरे के नाम से भी जाना जाता है. बाल ठाकरे का सार्वजनिक अस्तित्व तो बहुत बाद में उभरता है लेकिन प्रबोधनकार ठाकरे खुद एक सुधारवादी आंदोलनकारी थे. उन्होंने महाराष्ट्र की कई कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाया और संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया. बाल ठाकरे जब बड़े हुए तो विरासत में पिता से मिली चित्रकारी का कार्टून के रुप में प्रयोग करना शुरू किया. अपने भाई सीताराम ठाकरे (राज ठाकरे के पिता) के साथ मिलकर 1960 में उन्होंने मार्मिक नाम से एक कार्टून पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया. इससे पहले ही एक कार्टूनिस्ट के तौर पर बाल ठाकरे चर्चित नाम हो गये थे और उनके कार्टून न्यूयार्क टाईम्स में भी छप रहे थे. छह साल तक मार्मिक का काम करते हुए 1966 में उन्होंने शिवसेना की स्थापना कर दी. शिवेसना का तब भी एक ही घोषित एजेण्डा था कि मुंबई सिर्फ महाराष्ट्रवालों की है. हां, उस समय बाल ठाकरे या महाराष्ट्रवादियों के निशाने पर उत्तर भारतीय नहीं बल्कि दक्षिण भारतीय थे. राजनीति थोड़ी आधारभूत हुई तो परप्रांतीय के सवाल से आगे बढ़कर उग्र हिन्दुत्व को बाल ठाकरे ने अपना मुद्दा बना लिया और सत्तर के दशक में ही उन्होंने हिन्दू आत्मघाती दस्ते तैयार करने की योजनाओं पर काम करना शुरू कर दिया था. मुसलमानों को कैंसर बतानेवाले बाल ठाकरे इसे कैंसर का आपरेशन मानते थे.

साठ साल के अपने सार्वजनिक जीवन में बाल ठाकरे महाराष्ट्र से बाहर कभी कहीं नहीं गये. महाराष्ट्र में भाजपा के साथ मिलकर सत्ता प्राप्ति के बाद तो उन्होंने महाराष्ट्र में भी जाना छोड़ दिया और बांद्रा स्थित घर और नई मुंबई के फार्म हाउस के बीच सिमटकर रह गये. 1996 में पत्नी मीनाताई ठाकरे की मौत के बाद तो उन्होंने फार्महाउस जाना भी छोड़ दिया क्योंकि उनकी मौत फार्महाउस से लौटते हुए रास्ते में हृदयगति रुक जाने से हुई थी. बाल ठाकरे राजनीतिक रूप से भले ही कितनों को दुख पहुंचाते हों लेकिन खुद उनके निजी जीवन में सुखद क्षण कम ही रहा है. उन्होंने बड़े बेटे बिन्दुमाधव ठाकरे की मौत को बर्दाश्त किया. मझले बेटे जयदेव ठाकरे की घर से बगावत बर्दाश्त की. अपने प्रिय भतीजे और राजनीतिक हमशक्ल राज ठाकरे का दूर जाना बर्दाश्त किया. अब सबसे चहेती बहू स्मिता ठाकरे को भी अपने खिलाफ जाते देख रहे हैं. फिर भी निजी जीवन के क्लेष को बाल ठाकरे ने राजनीतिक समझदारी पर हावी नहीं होने दिया. भारतीय राजनीति में संभवत: क्षत्रप शब्द सटीकता से बाल ठाकरे से ही शुरू होता है और उन्हीं पर खत्म हो जाता है. ऐसे क्षेत्रीय राजनीतिक क्षत्रप ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आप बाल ठाकरे पसंद या नापसंद कर सकते हैं लेकिन उन्हें दरकिनार नहीं कर सकते. शायद यही राजनीतिक प्रशिक्षण अब वे अपने तीसरे बेटे उद्धव ठाकरे को दे रहे हैं. उद्धव जितना सीख पायेंगे महाराष्ट्र में शिवसेना का राजनीतिक भविष्य उतना ही होगा.

शार्प शूटरों को मिल रहा है भाजपा का संरक्षण

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image पुलिस की गिरफ्त शार्प शूटर अनिल और अजय

भोपाल। मध्य प्रदेश के मंदसौर पुलिस की गिरफ्त में आए सुधाकर राव मराठा गैंग के शार्प शूटर शेरसिंह सिंह ने पूछताछ के दौरान ऐसे राज उगले हैं जिससे भाजपा व संघ के राजनैतिक गलियारों में हलचल मचने की पूरी संभावना है। शेरसिंह के मुताबिक सुधाकर राव मराठा को फिरोज लाला रईस लाला व लल्या की हत्या करने की सुपारी देने में भाजपा के नेता और संघ के सक्रिय कार्यकर्ता शामिल थे।

वहीं सूत्रों से मिली जानकारी पर यकीन किया जाए तो मराठा गिरोह पर आपराधिक दुनिया में आने के पहले से ही संघ के कार्यालय प्रमुख रहे व सन 2004 के आसपास उज्जैन के संगठन मंत्री रहे बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता का हाथ रहा है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार इस मामले में 17 फरवरी बुधवार को अजय और अनिल मंजर के पकड़ाने के बाद से ही भाजपा के नेता इन्हें बचाने के लिए सक्रिय हो गए थे इसी के चलते ने वरिष्ठ नेताओं ने एसपी पर दबाव बनाने का प्रयास भी किया था। वहीं विश्वसनीय सुत्र के मुताबिक वारदात को अंजाम देने की निर्धारित दिनांक के पूर्व शेरसिंह ने अपने मोबाइल नंबर 9407108319, व 9756165732 से उक्त वरिष्ठ नेता के मोबाइल नंबर 9425192222 पर फोन से कईं बार बात की थी। जो इस बात को इंगित करती है कि इन सुपारी कीलरों के भाजपा व हिंदूवादी संगठनों से कितने प्रगाढ संबंध रहे है।

शेरसिंह ने पुलिस को बताया कि सुधाकर के साथ मिलकर यतीन भारद्वाज, और आशीष ने फिरोज व दो अन्य साथियों की हत्या साजिश रची थी। इसके लिए आशीष ने शेरसिंह को बोलेरो गाड़ी उपलब्ध करवाई थी और हथियार व पैसों का इंतजाम रतलाम के एक भाजपा नेता ने किया था। बोलेरों व हत्या में प्रयुक्त किए जाने वाले हथियार पुलिस ने शेरसिंह व अन्य आरोपियों के पास से जब्त किया है। बताया जाता है कि आशीष और फिरोज कीडोडा चूरा के व्यवसाय को लेकर कोई रंजिश चली आ रही थी जिसके चलते उसने फिरोज को रास्ते से हटाने का मन बना लिया था। लेकिन इससे पहले की आरोपी अपने काम को अंजाम दे पाते पुलिस ने मराठा गिरोह के दोनो शूटरों को बुधवार को गिरफ्तार कर लिया था।

यह था पूरा घटनाक्रम एक: दिनांक 17 फरवरी को पुलिस कप्तान जीके पाठक को मुखबिर से सूचना मिली थी कि कुछ सुपारी किलर बोंलेरो में सवार होकर के एक व्यवसायी की हत्या करने के लिए आने वाले है। पुलिस ने घेराबंदी कर किलारोड़ से अनिल उर्फ मंजर और अज्जु उर्फ अजय भोई को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने इनसे दो पिस्टल, दो देशी रिवाल्वर, 12 जिंदा कारतूस बरामद किए थे। शुक्रवार को इन्हें न्यायालय में पेश किया गया था। जहां से इन्हें 22 फरवरी तक की रिमांड पर भेज दिया गया। पूछताछ में दोनो आरोपियों ने पुलिस को बताया कि वेे एक व्यवसायी की हत्या करने के उद्देश्य से आए थे इस हत्या के षडय़ंत्र का मुख्य सरगना कुख्यात सुपारी किलर मराठा मौके से फरार हो गया था। दोनो आरोपियों के नाम रतलाम के चर्चित हत्याकांड रिजवानी में भी नाम शामिल है।

घटनाक्रम दो: इसी मामले से जुड़े हुए एक और आरोपी को पुलिस ने शुक्रवार को महाराणा प्रताप बस स्टैँड से एक देशी रिवल्वर और एक जिंदा कारतूस के साथ पकड़ा था। विशाल के खिलाफ अब तक छ: आपराधिक मामले पंजीबद्ध है। इसके बाद पुलिस रिमांड पर पूछताछ के दौरान शेरसिंह पिता बलवंत सिंह निवासी कोठड़ा माता का नाम सामने आया था जिसे पुलिस ने घेराबंदी कर गिरफ्तार किया था। उसके पास से पुलिस ने बोलेरों क्रमांक आर जे 14 यूसी 7823 भी जब्त की है। शेरसिंह के खिलाफ कईं आपराधिक मामले पंजीबद्ध है।

इस मामले में अब तक मंदसौर कोतवाली पुलिस में सात आरोपियों के खिलाफ मामला पंजीबद्ध कर लिया गया है । नामदर्ज आरोपियों में सुधाकर राव मराठा (अब तक पुलिस गिरफ्त से बाहर), शेरसिंह भदौरिया, यतीनद्र भारद्वाज निवासी रतलाम, राजेन्द्र भदौरिया अंकित पवार, अजय, अनिल पर धारा 115, 302 ,25, 27 में मामला दर्ज किया है। जिसमें हत्या की साजिश रचने और सुपारी देने जैसा संगीन अपराध शामिल है।

शार्प शूटर है सुधाकर राव मराठा, कई आपराधिक मामले दर्ज
निवासी गफूर पठान की हत्या करने में अ मराठा ही मुख्य आरोपी रहा है, वहीं रतलाम के रिजवानी हत्याकांड को अंजाम देने में मराठा की मुख्य भूमिका रही थी। इसके अलावा के मोहम्मद हनीफ की हत्या करने, पिंकी भार्गव मामले में षडय़ंत्र रचकर घटना को अंजाम देने में सुधाकर व साथी आरोपी रहेा है वहीं इन पर पुलिस पार्टी पर हमला करने जैसे संगीन अपराध भी पंजीबद्ध है। जानकारों के अनुसार मराठा के संबंध संगठन में प्रगाढ़ है और हर हत्या की साजिश रचने में मराठा की सहायता करने में भाजपा नेता दारोमदार उठाते रहे है।

सुधाकर राव मराठा की हत्या की साजिश रचने में संदिगध रहे आशीष गुप्ता केा मंदसौर में पूर्व गृह मंत्री के दांए हाथ के नाम से भी जाना जाता रहा है। लेकिन बताया जाता है इस बार के नगरीय चुनाव के बाद इनके संबंध में खटास आ गई है।

बाबा नित्यानन्द के साथ मोदी के पुराने रिश्ते

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तमिल स्वामी के सेक्सी विडियो के बाद स्वामी जी तो कही नहीं दिख रहे मगर इस मामले में गुजरात के मुख्मंत्री नरेन्द्र मोदी काफी परेशान हो गए है. परेशानी का कारण मोदी जी ने कुछ ही दिनों पहले वे न केवल स्वामी जी के साथ मंच पर उपस्थित थे बल्कि खुद नरेन्द्र मोदी ने यह माना था कि उनके स्वामी नित्यानंद से पुराने ताल्लुकात हैं. वे बाबा की विदेश यात्राओं से भी जुड़े रहे हैं.

बात है दक्षिण के संत नित्यानंद परमहंस की, जिनका आश्रम बंगलौर में है. अभी के समय में युवा संत में इनकी गिनती होती हे लेकिन उनके ऐसे एक विडियो जिनमे नित्यानंद तमिल की दो आभिनेत्रियों के साथ अश्लील हरकत करते देखे गए और यह बात बाहर आते ही लोगो में इस संत पर गुस्सा फूट पड़ा और दक्षिण भारत में अपना वर्चस्व रखने वाले इस संत का लोगो ने खूब विरोध किया. इस पूरे मामले में अभी तक स्वामी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई हे लेकिन यह बात गुजरात के लिए इस लिए खास हो जाती है क्योकि गुजरात के मुख्यमंत्री इस संत को बहुत पहले से जानते हैं और यह हम नहीं कहते खुद मोदी जी कह चुके हैं.

बात कुछ दिन पहले की है. स्वामी जी का एक प्रवचन वड़ोदरा में भी हुआ था जहां गुजरात के मुख्यमंत्री मुख्य मेहमान थे. यह कार्यक्रम ९ सितम्बर २००९ को वड़ोदरा में हुआ था जिसमें मोदी जी ने स्वामी नित्यानंद की एक पुस्तक (जीवन आनंद) विमोचन किया था. इस मौके पर नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि इन्हें मैं बहुत पहले से जनता हूं. इनके बंगलौर आश्रम में भी जा कर आया हूं. इन स्वामी जी तारीफ़ में मोदी ने कहा था कि इस समय जितने युवा संत हैं उनमें इनका स्थान बहुत ऊपर है. मोदी जी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि इनकी विदेश यात्रा में भी में किसी न किसी तरह जुड़ा रहा हूं.

मोदी के इसी बयान ने नरेन्द्र मोदी और राज्य भाजपा को मुश्किल में डाल दिया है. अगर मोदी जी उन्हें इतने करीब से जानते हैं तो क्या उन्हें स्वामी के उन कुकर्मों की भी जानकारी थी? गुजरात के राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि बालिकाओं की शिक्षा के लिए संत ने आखिर राज्य सरकार को दो लाख रूपये क्यों दिये? ज्ञात हो कि उसी कार्यक्रम में उक्त संत नित्यानंद ने नरेन्द्र मोदी को दो लाख रूपये का चेक दिया था ताकि राज्य में लड़कियों की शिक्षा बेहतर हो सके. उस वक्त मोदी ने स्वामी जी की तारीफ करते हुए कहा था कि यह अकेले ऐसे संत हैं जो किसी राज्य सरकार को लड़कियों की शिक्षा के लिए धन दे रहे हैं. लेकिन अब स्वामी जी के वीडियो फुटेज आने के बाद गुजरात में मोदी समर्थकों की नींद हराम हो रखी है.

संजय जोशी के सवाल पर भाजपा में बवाल

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नई दिल्ली। भाजपा की नयी कार्यकारिणी की घोषणा होनेवाली है. उम्मीद है कि अगले एक दो दिनों में भाजपा की नयी कार्यकारिणी की घोषणा हो जाएगी लेकिन संजय जोशी के नाम को लेकर अभी भी भाजपा में कोई फैसला नहीं हो पा रहा है. नितिन गडकरी हर हाल में उन्हें अपनी टीम का हिस्सा बनाकर रखना चाहते हैं जबकि आडवाणी और उनके करीबी संजय जोशी की इन्ट्री नहीं होने देना चाहते.

संजय जोशी के सवाल पर आडवाणी और नितिन गडकरी आमने सामने हैं. नितिन गडकरी की पूरी टीम फाइनल हो गयी है लेकिन अनुशासन का ऐसा डर कि भाजपा कार्यालय के अपने दफ्तरों में बैठकर खबर बांटने का कारोबार करनेवाले नेता इस बार खबरों का कोई प्रसाद नहीं बांट रहे हैं. किसका नाम फाइनल है और कौन भाजपा की नयी टीम का हिस्सा होगा, कुछ भी लीक नहीं किया जा रहा है लेकिन संजय जोशी का सवाल आया तो दोनों ओर से तरवारें खिंच गयीं.

आडवाणी और उनके समर्थक संजय जोशी को नहीं आने देना चाहते. सेक्स सीडी काण्ड में फंसे संजय जोशी को लेकर आडवाणी और उनके समर्थक मानते हैं कि अगर वे दोबारा से पार्टी में पदाधिकारी के रूप में वापस लौटते हैं तो उससे पार्टी की छवि को नुकसान होगा. जबकि हकीकत यह है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी नहीं चाहते कि संजय जोशी को केन्द्रीय टीम में कोई जगह मिले, नहीं तो उन्हें सीधी चुनौती मिल सकती है. लेकिन मूलत: नागपुर के संजय जोशी नितिन गडकरी के राजनीतिक आका रहे हैं और अध्यक्ष बने गडकरी संजय जोशी को कम से कम उपाध्यक्ष तो बनाना ही चाहते हैं. सोमवार को दिल्ली में नानाजी देशमुख की याद में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में संघ और भाजपा के कई शीर्ष नेता उपस्थित थे. इस मौके पर संजय जोशी भी अपने लाव लश्कर के साथ मौजूद थे. लेकिन जैसा कि उनका स्वभाव है पूरे समय वे पांडाल के बाहर ही नजर आये.

बहरहाल, अब नयी कार्यकारिणी की घोषणा के वक्त ही पता चलेगा कि संजय जोशी का पलड़ा िकस ओर झुकता है. उनके शिष्य उन्हें अपनी टीम में शामिल करने में सफल होते हैं या फिर विरोधी बाहर बैठाने में कामयाब हो पाते हैं. संजय जोशी के लिए उनके कुछ नजदीकी लोगों ने संगठन महासचिव बनाने का भी प्रस्ताव किया था. शायद उन्हें उम्मीद थी कि ज्यादा की मांग करेंगे तो थोड़ा तो मिल ही जाएगा. इसलिए अब नयी टीम की घोषणा के इंतजार से ही काई साफ होगी और पता चलेगा कि आखिर घमासान ने क्या रुख अख्तियार किया.

'छोटे' गांधी बने भाजपा के बड़े संकट

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भाजपा के युवा तुर्क वरुण गांधी भारतीय जनता पार्टी के लिए गले की हड्डी बन गये हैं. दो एक दिनों में भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा होनेवाली है और वरुण गांधी को लेकर भाजपा और संघ में जबर्दस्त उहापोह की स्थिति बनी हुई है. संघ का दबाव है कि उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाए लेकिन भाजपा में एक वर्ग ऐसा है जो वरुण गांधी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने के सवाल पर विद्रोह के मूड में है.

वरुण गांधी भाजपा के टिकट पर पीलीभीत से सांसद हैं और वे भाजपा नेता प्रमोद महाजन की पहल पर भाजपा में आये थे. उनकी मां मेनका गांधी पहले भाजपा के समर्थन से लोकसभा पहुंचती जरूर थीं लेकिन सीधे तौर पर भाजपा में शामिल नहीं हुई लेकिन प्रमोद महाजन ने पहल करके वरुण को भाजपा में शामिल करवाया. पीलीभीत में हिन्दुओं के हित में दिये गये एक भाषण के कारण जेल की हवा खाकर बाहर आये वरुण गांधी धुर हिन्दुत्ववादी नेता की छवि उभरी है जिसके प्रशंसक न केवल भाजपा में हैं बल्कि संघ और सहयोगी शिवसेना भी वरुण गांधी को सच्चा गांधी मानती है.

शायद इसीलिए संघ वरुण गांधी को पार्टी का महासचिव बनाये जाने का दबाव बना रही है. लेकिन दिक्कत यह है कि अगर वरुण गांधी महासचिव बन जाते हैं तो उनकी सक्रियता मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में ही होगी ऐसे में प्रदेश के कुछ नेता इसकी खिलाफत कर रहे हैं. भाजपा अध्यक्ष के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि अगर एकदम से वरुण गांधी को महासचिव बना दिया गया तो पार्टी में विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी. एक तो उम्र में वे बहुत छोटे हैं ऊपर से पार्टी में उनसे अधिक सक्रिय और कार्यक्षम लोग हैं जिन्हें भाजपा महासचिव बनाने की संभावना है. लेकिन संघ का दबाव है कि वरुण गांधी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के साथ साथ उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी भी मिलनी चाहिए. उत्तर प्रदेश भाजपा के एक बड़े नेता और राम मंदिर आंदोलन के उग्र नेताओं में रहे एक नेता कहते हैं कि लोकसभा चुनावों में हार की जो समीक्षा हुई है उसमें वरुण गाँधी का भाषण भी कारण गिना गया है. आज जब पार्टी अध्यक्ष मुसलमानों को करीब लाकर सर्वधर्म समभाव की राजनीति की ओर आगे बढ़ रही है ऐसे में वरुण गांधी को आगे करने से पार्टी के प्रयासों को धक्का लगेगा. जाहिर है, उत्तर प्रदेश की कमान अगर वरुण के हाथ में दी जाती है तो भाजपा के अंदर ही कम घमासान नहीं होगा.

लेकिन संयोग से वरुण गांधी को राजनाथ सिंह के रुप में एक बड़ा समर्थक मिला हुआ है. उधर वरुण गांधी की मां मेनका गांधी ने भी वरुण को छूट दे दी है कि अगर वे भाजपा में अपना राजनीतिक भविष्य नहीं देखते हैं तो कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं. इंदौर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आये वरुण ने कहा भी था कि गांधी सुनने के नहीं सुनाने के अभ्यस्त होते हैं. साफ है, वरुण गांधी को अगर भाजपा में अपना भविष्य सुनिश्चित नहीं दिखता है तो वे उग्र हिन्दुत्व को मुद्दा बनाकर आगे अपनी सक्रियता किसी और प्रकार से भी बढा सकते हैं. इसके लिए उनकी मां का समर्थन उन्हें पहले ही मिल चुका है. बहरहाल, आखिरी निर्णय हुआ नहीं है, और जब होगा तभी साफ होगा कि छोटे गांधी को भाजपा कहां स्थापित करती है. वैसे एक अफवाह यह भी है कि बड़े भैया ने छोटे गांधी के पास संदेश भिजवाया है कि अगर उदार होकर राजनीति करनी है तो कांग्रेस अच्छा विकल्प साबित हो सकती है. सच्चाई कितनी है पता नहीं लेकिन अब तो गड़करी के पत्ते खोलने के बाद ही पता चलेगा कि वरुण गांधी का ऊंट किस करवट बैठेगा.

क्या भाजपा में वापस आ चुकी हैं उमा भारती?

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image भाजपा नेताओं के साथ अगली पंक्ति में उमा भारती

बीते माह में इंदौर में संपन्न भाजपा की राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान उमा भारती को पार्टी में वापसी की घोषणा भले ही नहीं हो पाई हो, पर ऐसा लगता है कि उमा अब भाजपा में वापस आ चुकी हैं और भाजपा के लिए काम करना शुरू भी कर दिया है. वे अब पूरी तरह से भाजपा की हो चुकी हैं.

हां, उमा की भाजपा में वापसी की अधिकारिक घोषणा नहीं हुई है. पर पार्टी अध्यक्ष गडकरी ने उनकी पार्टी में वापसी पर मुहर लगा दी है। इंदौर अधिवेशन के दौरान उमा की पार्टी में वापसी की घोषणा इसलिए नहीं हो पाई, क्योंकि पार्टी अधिवेशन से करीब सप्ताह भर पूर्व नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में मोहन भागवत से मुलाकात कर चुकी उमा की खबरे मीडिया में आ गई। पार्टी के अंदर और बाहर तरह-तरह की चर्चाएं हुईं। आखिर निर्णय यह लिया गया कि फिलहाल उमा की पार्टी में वापसी की घोषणा टाल दी जाए। उचित मौका देकर घोषणा की जाएगी। लेकिन उमा तब संघ और भाजपा एजेंडा के मुताबिक सक्रिय होकर कार्य करें।

गडकरी और भागवत के निर्देशानुसार उमा भारती इन दिनों विभिन्न जगहों पर घूम-घूम पर संघ की योजना के अनुसार विविध अभियानों के तहत जमीनी स्तर पर हिंदुत्व की नीति को मजबूत करने के काम में जुटी है। फिलहाल खबर लिखने तक यह सूचना थी कि उमा भारती उज्जैन में हिंदुत्व से संबंधित एक कार्यक्रम में हिस्सा ले रही थीं। नई दिल्ली में नानाजी देशमुख की श्रद्धांजलि सभा में भी उमा भारती को पूरा महत्व मिला और वे पार्टी नेताओं के साथ अगली पंक्ति में बैठी हुई थीं.

ज्ञात हो कि भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद नागपुर में एक पत्रकार से अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि वे पार्टी से बाहर गए जनाधार वाले दिग्गज नेताओं की घर वापसी चाहते हैं। बाद में जब यह मामला सुर्खियों में आया तो गडकरी ने कहा कि यदि पार्टी से निकले नेता पार्टी में दुबारा वापस आना चाहते हैं तो इस पर पार्टी और संबंधित नेता के राज्य स्तर की ईकाई से चर्चा करके ही निर्णय लिया जाएगा। उसके बाद फरवरी के दूसरे सप्ताह उमा संघ मुख्यालय में आकर मोहन भागवत से मुलाकात कर चुकी थीं। संघ सूत्रों और उमा भारती के नजदीकी लोगों ने भाजपा में उनकी वापसी की पुष्टि पहले ही कर दी है।

नारी मुक्ति का नाजायज नारा

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आज अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस का अनुष्ठान है. आज सरकारी तौर पर लम्बे -चौड़े वक्तव्य,विज्ञापन,संकल्प, धूमधडाका, विमर्श, कार्यशालाओं आदि के आयोजन होंगे. सवाल पैदा होता है कि क्या एक दिन महिलाओं के नाम पर इस तरह के औपचारिक अनुष्ठान संपन्न करा लेने भर से महिलाओं का समग्र कल्याण हो जाना निश्चित है?

क्या हम को पश्चिम से चली नारी-स्वाधीनता की भोगवादी आंधी को सहज स्वीकार लेना चाहिए? स्वामी विवेकानंद कहते थे कि भारत में नारी के रूप में जन्म लेना नर के रूप में जन्म लेने की तुलना में अधिक पुण्य-फल प्रदान करनेवाला होता है. हालांकि पश्चिमी संकृति के सामने हमारी हिन्दवी संस्कृति को दकियानूस मानने वाला वर्ग हमारे 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' को दंभ भरी अनर्गल उक्ति से अधिक कुछ भी माने को तैयार नहीं होंगे. यह भी सच है कि आज भी इस देश में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो कन्या के जन्म को दुर्भाग्य मानते हैं,पर इस सच से रत्ती मात्र भी यह सच्चाई भी कम नहीं की इस देश का लोक मानस नारी को पूज्य मानता रहा है. अवधी का एक मशहूर गीत है-

'काहे बिन सून अंगनवा ये बाबा, काहे बिन सून लख राव, काहे बिन सून दुवरवा ये बाबा, काहे बिन पोखरा तोहार!

तोहरे बिन सून अंगनवा ये बेटी, कोइलारे बिन लख रावँ, पूत बिन सून दुवरवा ये बेटी, हंसा बिन पोखरा हमार!'

कन्या अपने पिता से पूछती है- पिताजी, किसके बिना आँगन सूना हो जाता है,किसके बिना आमों का बाग़,किसके बिना दरवाजा सूना लगता है,किसके बिना तुम्हारा पोखर? पिता उत्तर देते हैं- बेटी, तुम्हारे बिना आँगन सूना हो जाएगा, कोयल बिना आमों का बाग़, पुत्र के बिना दरवाजा सूना लगता है और हंस के बिना पोखर. यहाँ हंस का अर्थ दामाद से लिया जाता है. जिस देश के लोक गीतों में नारी को हजारों रिश्तों के केंद्र के रूप में मान्यता रही हो वहाँ कोई नारी को बंधन से मुक्त कराने की बात करे तो अजब नहीं लगता? इस देश में नारी तो अपने मायके में वाणी, लक्ष्मी की तरह पुजाती है. वह मायके से ससुराल तक किसी की ननद है, किसी की भाभी है, किसी की जेठानी, किसी की देवरानी, किसी की दीदी, किसी की लाडली, किसी की बहू, किसी की अनुज-वधु, किसी की चाची, किसी की मौसी, किसी की बुवा. स्वामी विवेकानंद ने नारी को इस सहस्र कमल दल रुपी रिश्तों के बीच निहारा होगा सहस्र कमल दल के बीच उसके पराग कण रुपी सर्जन की क्षमता में उन्होंने नारी की पुण्यदायिनी क्षमता को प्रस्फुटित होते देखा होगा. पश्चिम नारी के जिस स्वरुप का आदी है वह नारी निरे यौन आकर्षण के केंद्र से बाहर अपना विस्तार नहीं पाती. यौनाकर्षण में घुट कर पश्चिम की नारी चुक जाती है.पश्चिम की नारी बांधवी स्वरुप को कैसे समझे? वहाँ के बाप ने तो बालिग़ होते ही कन्या को बेगानेपन के ऊसर में खदेड़ दिया है. माँ को बोझ करार दे दिया है.पश्चिम के समाज से कहा जाए कि माँ के हाथ की मकुनी अमृत समान होती है तो वह तर्क के धरातल पर उसे खारिज कर देगा. संयुक्त परिवार तो उसकी कल्पना में ही नहीं आ सकता. हमारा समाज शहरीकरण के दबाव को झेलकर भी अभी रिश्तों के बंध्याकरण का शिकार नहीं हुआ है. आंटी-अंकल के रिश्ते भले ही इस देश में भी सर्वव्यापी हो गए हों, बावजूद इसके मित्र की पत्नी उम्र में छोटी होते ही बहू बन जाती है. बड़ी हुई तो उसे भाभी कहने में संकोच नहीं होता. मित्र की बहन हमारी बहन ,बुआ से बुआ वाला रिश्ता हम क्यों जोड़ लेते हैं? इन रिश्तों के आते ही हमारा उनकी ओर देखने का भाव क्यों बदल जाता है?

'दुर्गा सप्तशती' में 'स्त्रियः समस्त्रातव देवि भेदः' में इसी तथ्य को दर्शाया गया है. स्त्री की प्रत्येक भंगिमा में देवी का कोई न कोई भाव,कोई न कोई सौन्दर्य रूपायित होता है. इसलिए भारतीय संस्कृति ने माना कि नारी का शरीर केवल भोग्य नहीं है वह पश्चिमी संस्कृति की समझ की तरह केवल वास्तु नहीं है,बल्कि वह शक्ति पुंज है.इस संस्कृति में नर-नारी सम्बन्ध परस्पर यौन संबंधों पर आधारित नहीं है. वरना 'महाभारत' द्रौपदी कृष्ण की बहन होकर कृष्णा कैसे बन जाती? जो सम्मान पटरानी होकर रुक्मिणी नहीं पाती वह द्रौपदी के हिस्से कैसे चला जाता? 'उत्तर रामचरित' की वासंती तो राम को भी फटकारती है और विरह दग्ध राम की खातिर सीता को भी उलाहने देती है. समाज से नारी के अनत रिश्तों ने ही उसे अलग-अलग मौकों पर मया,मोहमयी रजनी, काली-कंकाली, दयामयी, रागमयी, लालासामायी लक्ष्मी, उल्हासमायी , प्रकाशमयी सरस्वती बना दिया. नारी समस्त सृष्टि की साधना और आकांक्षा है. नारी जिस कुल में जन्म लेती है उसे तारती ही है साथ ही जिस कुल में ब्याही जाती है उसे भी तार देती है. इसलिए जो नारी उत्पीडन के कुछ आंकडे देकर इस देश को नारीवाद का उपदेश देने निकल पड़े हैं उन्हें समझना होगा कि जिस देश में वैदिक काल से लोपमुद्रा ऋचाएं रचती रही ही उसे नारी स्वातंत्र्य का उपदेश पश्चिमी मापदंड पर नहीं दिया जा सकता. इस देश में तो सृष्टि की रचना ही नारी से मानी गयी है,पृथ्वी को नारिस्वरूपा समझा गया है.स्वर्गीय आचार्य नरेन्द्रदेव कहा करते थे कि संस्कृति मानव चित्त की खेती हुआ करती है. हिन्दवी मानस नारी के सम्मान में झुका रहता है,इसलिए यहाँ का देवता भी अर्धनारीश्वर होता है, इसलिए नारी को हिस्सेदारी के कानूनी जामे में बांधना महज विधिक व्यस्थापन के अलावा कुछ और नहीं.नर और नारी सृष्टि रूपी वाहन के दो समान पहिये हैं, उनमें कोई किसी से कमजोर होगा तो सृष्टि का सहज संचालन ही कठिन हो जाएगा. हमारा देश तो नारी युग में जीता है उसे नारी दिवस का दिया दिखाने का क्या औचित्य?

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है भ्रष्टाचार

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हरिद्वार। सुरक्षा की समस्याओं के लिए प्रत्येक पहलुओं पर सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। भ्रष्टाचार का विकराल रूप राष्ट्रीय सुरक्षा में सबसे बड़ी बाधा है, जिसे दूर करने करने के लिए सरकार को ठोस उपाय करने होंगे, जिसे दूर करने के लिए गैर सरकारी संगठनों की भूमिका बड़ा योगदान दे सकती है। उक्त विचार रक्षा विशेषज्ञ अभिजीत भट्टाचार्य ने फोरम फोर इंटिग्रेटेड नेशनल सिक्योरिटी (फिन्स) द्वारा भारत माता मन्दिर में आयोजित राष्ट्र रक्षा सम्मेलन बोलते हुए व्यक्त किये।

आज पहले और दूसरे सत्र में देशभर से आये प्रतिनिधियों को स्वामी नरेन्द्रानंद, राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष डॉ. पूर्णिमा आडवाणी, पूर्व रक्षा सचिव योगेन्द्र नारायण, आई.बी. के पूर्व निदेशक अजीत डोवाल, पूर्व आई.जी. (जम्मू-कश्मीर) पी.सी. डोगरा, आर.एस.एस. के पूर्व सरसंघचालक के.सी. सुदर्शन, रिटायर्ड जस्टिस बी.एस. कोकजे, अशोक साहू, राजखोवा, श्रीमती ज्योथनपारी, पी.सी. डोगरा, डॉ. प्रो. नाहिद सेख, डॉ. दारक्षण, डॉ. श्रीमती विजेन्द्र, लै. कर्नल (सेवा निवृत्त) लक्ष्मी, बिग्रेडियर कुलदीप सिंह, श्री जसवोलिया व श्री समनउल्ला ने सम्बोधित किया।

वक्ताओं ने जम्मू-कश्मीर विषय पर सरकार की नीतियों की खामियां गिनाई। वक्ताओं ने कहा कि आतंरिक सुरक्षा को रोकना उतना ही मुश्किल है जिस प्रकार गंगा की अविरल धारा को नहीं रोका जा सकता। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंडरा रहे खतरे का एक कारण नहीं है अपितु अनेक कारण हैं जिसमें भ्रष्टाचार, जनसंख्या, भाषा, सम्मान और सजा प्रणाली मुख्य कारण है। उन्होंने इन कारकों पर अंकुश लगाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिये। भ्रष्टाचार पर बोलते हुए वक्ताओं ने कहा कि भ्रष्टाचार को खत्म करना तो मुश्किल है लेकिन अगर प्रयास किया जाये तो इसे कम अवश्य किया जा सकता है जिसके लिए जनता को जागरूक रहना जरूरी है। वक्ताओं ने बढ़ती जनसंख्या को सीमित साधनों पर भारी बताते हुए कहा कि जैसा कि अनुमान है कि 2052 तक भारत की जनसंख्या 118 करोड़ से बढ़कर ठीक दो गुना हो जायेगी। जनसंख्या बढ़ेगी तो आपूर्ति की मांग भी बढ़ जायेगी और उद्योग बढ़ेंगे, तो तय है कि महंगाई भी बढ़ती जायेगी। वक्ताओं ने संसद हमले के आतंकी अफजल गुरू की ओर इशारा करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फांसी की सजा सुनाये जाने के बावजूद राजनीतिक संरक्षण के चलते आज तक उसे फांसी नहीं दी जा सकी। वक्ताओं का कहना था कि दुनिया में भारत जैसे देश से बेहतर कोई अन्य नहीं है लेकिन एप्लीकेशन की कमी की बड़ी समस्या है।

वक्ताओं ने भारत सरकार पर आरोप लगाया कि उसकी घुटना टेक नीति के कारण आतंकवाद को संरक्षण मिल रहा है। वक्ताओं ने प्रचण्ड हुंकार भरते हुए कहा कि जब तक सरकार की दण्ड प्रक्रिया कमजोर रहेगी तब तक आतंकवाद पर लगाम लगाना असम्भव है। तालियों की गड़गड़ाहट के मध्य वक्ताओं ने यह भी कहा कि पंथ निरपेक्षता की छाप हमारे दिलों पर हावी है इसलिए हम चींटी भी नहीं मारना चाहते। किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्याय सहना अन्याय करने से भी अधिक पाप है। हम शांति के पक्षधर हैं किन्तु भारत की अस्मिता पर कोई निगाह डालता है तो हमें ईंट का जबाव पत्थर से देना होगा। हम अपनी आत्मिक शक्ति को पहचानें। हम सब में एक ही आत्मा है किन्तु राष्ट्र का चिन्तन एवं राष्ट्र का स्वाभिमान हमारे लिए सर्वोपरि है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि अमेरिका आतंकवाद को संरक्षण दे रहा है। हम कबूतर उड़ाते हैं तथा शांति की बात कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं, यह कायरता का द्योतक है। हमारे जवानों को मनोबल गिरता है। आतंकवादियों को फांसी देने में विलम्ब से भी स्थिति बिगड़ रही है।

वक्ताओं ने कहा कि हमारी आंतरिक सुरक्षा और बाह्य सुरक्षा एक-दूसरे पर पूरी तरह निर्भर है। इनको अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। पाकिस्तान के प्रमुख लोग यही बोलते हैं कि भारत ने हमारा बंगलादेश छिना है, हम कश्मीर लेकर रहेंगे। हमारे कुछ लोग यह कहते हैं कि पाकिस्तान का मजबूत होना भारत के हित में है परन्तु मेरी राय में यह गलत है, पाकिस्तान चाहे कमजोर हो, चाहे महबूत हो, उसको आप चाहे जितनी भी सुविधायें दें, उससे हमारे देश का लाभ नहीं होगा। अब पाकिस्तान के साथ चीन, अमेरिका की सामरिक मद्द भी जुड़ गयी है। पहले भारत और पाकिस्तान की सैनिक शक्ति का अनुपात 1 के मुकाबले 1:8 था जो अब भारत की शक्ति घटकर उनके मुकाबले 1:3 ही रह गयी है। इसलिए हमें ऐसी नीतियां अपनानी चाहिए जिससे अमेरिका की सैनिक शक्ति पाकिस्तान को बड़ी मात्रा में प्राप्त न हो। आतंकवाद पर बोलते हुए वक्ताओं ने कहा कि अब आतंकवाद अनेक शहरों में घुस गया है इसलिए समय आ गया है कि भारत अपने नोजवानों को अनिवार्य रूप से सैन्य शिक्षण देना प्रारम्भ करें। साथ ही भारत को कश्मीर में अपने देश के नागरिकों को भूमि खरीदने के अधिकार अवश्य देने चाहिए। आतंकवाद को रोकने के लिए ये दोनों बिन्दु परम आवश्यक हैं।

72 घंटे में 10 किसानों ने की आत्महत्या

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नागपुर। जब सरकार देश की राजधानी नई दिल्ली में महिला आरक्षण, महिला उत्थान और महिला सशक्तिकरण और महिला आरक्षण विधेयक की चर्चा आदि में व्यस्त थी, तभी किसान आत्महत्या की राजधानी विदर्भ में कृषि संकट से त्रस्त 10 किसानों ने मौत को गले लगा लिया। आत्महत्या करने वाले छह किसान यवतमाल, दो अकोला, एक वाशिम और एक नागपुर जिले के हैं।

जून 2005 से अब तक विदर्भ क्षेत्र में मौत को गले लगाने वाले किसानों की कुल संख्या 7860 हो चुकी है। फिलहाल विदर्भ भीषण जल संकट से जूझ रहा है। सरकारी सर्वे में सूखे से प्रभावित किसान परिवारों की संख्या करीब 2 मिलियन बताई गई है। राज्य सरकार इस वर्ष अनुसार बीस हजार गांवों को पहले ही सूखा ग्रस्त घोषित कर चुकी है।

विदर्भ जन आंदोलन समिति के किशोर तिवारी ने बताया कि प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार सूखा, जल संकट, चारा, भोजन और बेरोजगारी का संकट विदर्भ में 15,460 गांवों तक पहुंच चुकी है। जून 2006 में केंद्र सरकार की ओर से घोषित किसानों के लिए राहत पैकेज भी किसानों के लिए लाभकारी नहीं रहे। महाराष्ट्र सरकार ने जिन गांवों को सूखाग्रस्त घोषित किया है, उनके लिए चलाए जा रहे राहत कार्य कागजों पर ही सीमित हैं। सूखा पडऩे से मवेशियों के लिए चारे का संकट गंभीर हो गया है। लोग अपने पशु कसाइयों के हाथों में बेच रहे हैं। चारा संकट के कारण मवेशी भी असमय काल के गाल में समा रहे हैं।

किशोर तिवारी ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि वे विदर्भ के मामले में स्वयं हस्तक्षे कर किसानों को सिंचाई का पर्याप्त पानी, मुफ्त स्वास्थ्य सेवा, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार आदि सुनिश्चित कराये जिससे किसान आत्महत्या रूक सके। ज्ञात हो कि जून, 2005 से अब तक 7860 किसानों ने आत्महत्या कर ली है। वहीं सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1998 से अब तक करीब 40 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

नेक काम लेकिन नीयत पर शक

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इस महिला आरक्षण विधेयक के कई पहलू हैं। ऐसा तो होगा नहीं कि सभी आरक्षित सीटों पर नेताओं की बीबीयां ही मैदान में उतरेंगी। ऐसा भी नहीं है कि किसी महिला कार्यकर्ता ने जगह नहीं बनाई। सुषमा स्वराज या मायावती किसकी बीबी हैं? वो तो अपने ही दम पर आगे आईं हैं। मगर ऐसी महिलाओं की संख्या कम है। आरक्षण के बाद से ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ने लगेगी।

सबसे पहले तो महिला आरक्षण विधेयक के राज्य सभा में पास होने पर बधाई। पहली बार हिन्दुस्तान में जाति आधारित राजनीति की हार हुई है। जाति आधारित राजनीति बेचारी नज़र आई है। आरक्षण का मैं समर्थक रहा हूं। मानता हूं कि दुनिया में इससे बेहतर और कारगर कोई सामाजिक नीति नहीं है। लेकिन इसकी एक सीमा है जो प्राइवेट कंपनियों में आरक्षण की मांग के बहाने झलकती है तो महिला आरक्षण के बहाने खास जाति समुदाय के आरक्षण की मांग के बहाने झलकती है।

लेकिन नीयत पर सवाल की गुज़ाइश अब भी है। 1996 से इस बिल का ड्राफ्ट सबके सामने है। क्या कभी किसी राजनीतिक दल ने अपने पार्टी के स्तर पर महिलाओं की संख्या बढ़ाने की कोशिश की। नहीं की। क्या कांग्रेस ने मुस्लिम महिलाओं को टिकट देने में उदारता दिखाई। मर्द मुस्लिम उम्मीदवार तो छोड़ दीजिए। बीजेपी एक ऐसी पार्टी है जो नाम के लिए एक या दो लोगों को टिकट देती है। देश की एक प्रमुख विपक्षी पार्टी में मुसलमानों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। इसकी वजहें भी साफ हैं। अगर मुसलमानों के लिए महिला आरक्षण के भीतर आरक्षण होता तो क्या बीजेपी वहां उम्मीदवार नहीं उतारती? उतारना पड़ता। इस बहाने कानूनी तौर पर हम बीजेपी को मजबूर कर सकते थे कि बीजेपी मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देने के लिए बाध्य हो। क्या करती बीजेपी। सहारनपुर की सीट मुस्लिम महिला के लिए रिज़र्व हो जाती तो। कहती कि उम्मीदवार नहीं उतारेंगे या किसी बिजनेसमैन मुसलमान के घर जाती, हाथ पांव जोड़ती और कहती कि प्लीज़ आप अपनी बेग़म को समझाइये कि हमारी पार्टी का उम्मीदवार बन जाएं। इस तरह से महिला आरक्षण के बहाने सेकुलरिज़्म का एजेंडे में सबको समेट लेने का मौका मिल जाता। लेकिन दलीलें इसके ख़िलाफ़ दी जाती रही हैं। इसलिए बीजेपी कांग्रेस के इस प्रस्ताव पर सहमत हो गई। ये एक मौका था, बीजेपी को भी मजबूर करने का कि वो अपने भीतर मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ाये।

मुसलमान का वोट सबको चाहिए लेकिन जब कोई आज़म ख़ान कल्याण सिंह को लेकर मुलायम सिंह यादव के ख़िलाफ़ खड़ा होता है तो सब मिलकर आज़म ख़ान की गत निकाल देते हैं। कोई दल उनका साथ नहीं देता। मायावती की पार्टी में मुसलमान विधायकों की संख्या तो है लेकिन उनका कोई स्वतंत्र वजूद नहीं। फिर भी वहां नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं की अहमियत दिखाई पड़ती है। शायद यही वजह रही होगी कि बीएसपी ने सदन का वॉकआउट किया।

राजनीति वो ज़रिया है जिसके सहारे सभी समाजों को समय के अलग-अलग चक्रों में आगे बढ़ने और अपनी भागीदारी बढ़ाने का मौका मिलता है। मुसलमानों को आज तक नहीं मिला। उनका वोट सबको चाहिए। नेता नहीं चाहिए। इस लिहाज़ से आप देखें तो सिर्फ मुसलमान हैं जो बिना किसी उम्मीद और शर्त के वोट करते हैं। मुस्लिम वोटर अपने चरित्र में ज़्यादा राष्ट्रीय है। यह नहीं कहता है मेरी इतनी संख्या भारी तो दो मुझको भी हिस्सेदारी। न ही जब मुसलमानों की बारी आती है तो पार्टियां ऐसा करती हैं। मुस्लिम मध्यमवर्ग तैयार हो रहा है। राजनीति की मुख्यधारा से सक्रिय रूप से जोड़ने का ये अच्छा मौका था। मान लीजिए मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व का कोई स्तर नहीं है। चाहें वो किसी भी पार्टी में हों,उनका कोई वक़ार नहीं है। लिज़लिज़े हैं सब। किसी ने आवाज़ तक नहीं उठाई। ओवैसी जैसे एकाध सांसद चिल्लाते रहे लेकिन मुस्लिम सांसद अपनी मजबूरियों के ख़ौफ से इस ऐतिहासिक बिल को अपनी गली की तरफ मोड़ने में नाकाम रहे। जो मुस्लिम सांसद अपनी सांसदी नहीं छोड़ सकते वो क्या ख़ाक़ अपने क़ौम की बात करेंगे। मेरी यह दलील किसी काम की न होतीं अगर टिकट देने के मामले में बिना धर्म का ख़्याल किये पार्टियों को मुस्लिम नौजवानों में राजनीतिक नेतृत्व का कौशल नज़र आता।

अब देश में कामयाब महिलाओं का दो समूह होगा। एक वो जो अपने दम पर अंतरिक्ष की यात्रा कर आती है और एक वो जो आरक्षण के दम पर संसद की यात्रा करेगी। दोनों प्रक्रियाओं से आधी आबादी को दुनिया के मंच पर आने की रफ्तार तेज होगी। हज़ारों सालों से जिन्हें कमरे में बंद कर रखा गया है,उन्हें बाहर निकालने के लिए घर के सारे दरवाज़े खोलने ही होंगे। तीसरी बात है। क्या आरक्षण अब अपना राजनीतिक महत्व खोने की दिशा में जा रहा है? अति आरक्षण एक मजाक है। ग़रीब सवर्णों के नाम पर आरक्षण की मांग अभी बाकी है। बीएसपी इसकी वकालत करती है। आर्थिक, जाति और जेंडर के आधार पर आरक्षण को लेकर कोई प्रॉब्लम नहीं तो धर्म को लेकर क्यों होता है? इसलिए कि आरक्षण मुसलमानों को मिल जाएगा? चौथी बात है। जिस मंडल की राजनीति ने मंदिर आंदोलन की हवा निकाल दी,वो महिलाओं के आगे निरस्त हो गया। मंदिर को हराने वाला मंडल,महिलाओं से हार गया है। यादव त्रयी बेचारे नज़र आए। उनकी बातों पर चर्चा किये बिना बाकी दलों ने किनारे ठेल दिया। ये कुछ सवाल है जो मेरे मन में उभर रहे थे,बिल पास होने की खुशी के उतार-चढ़ाव में।

(रवीश कुमार एनडीटीवी इंडिया के फीचर एडीटर और संवेदनशील पत्रकार हैं.)

बाबर के बराबर हुए राम

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इंदौर के कुशाभाऊ ठाकरे नगर में भारतीय जनता पार्टी का तीन दिवसीय अधिवेशन चल रहा है.इस अधिवेशन से भाजपा कि भावी दिशा तय होनी है.भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने इस अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में मुसलामानों को राष्ट्र की मुख्यधारा में जोड़ने का प्रयास किया है.

गडकरी को भाजपा के अध्यक्ष पद का सूत्र संभाले डेढ़ माह बीत चुके हैं. राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा कि नीतियों को लेकर उनका विचार पहली बार सामने आया है. गडकरी का कहना है कि भाजपा अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनवाने के प्रति कृतसंकल्प है. गडकरी ने याद दिलवाया है कि राम मंदिर निर्माण के लिए भाजपा पहले भी आन्दोलन कर चुकी है और उसमें कारसेवकों ने अपना बलिदान भी किया है. गडकरी ने अत्यंत विनम्रता से मुस्लिमों से अपील कि है कि वे अयोध्या में राम मंदिर परिसर हिन्दुओं के लिए छोड़ दें. गडकरी ने मुसलामानों से सहृदयता का परिचय देनें की प्रार्थना भी की है. उनका मत है कि यदि मुसलमान उनकी इस मांग से राजी हो जाएं तो इस देश में भाईचारे और विकास के नए युग का सूत्रपात हो जाएगा।

भाजाप के नेता 1990 के दशक में कहते थे कि राममंदिर का फैसला अदालत की परिधि में नहीं हो सकता. 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह यही तो कह रहे थे कि उन्हें विश्व हिन्दू परिषद और भारतीय जनता पार्टी मामले को न्याय की परिधि में निपटाने का अवसर दें. लालकृष्ण आडवाणी की बहुचर्चित सोमनाथ से अयोध्या की बहुचर्चित यात्रा के पहले भी तत्कालीन वीपी सिंह सरकार के ट्रबल शूटर इसी लाईन पर काम कर रहे थे. चंद्रशेखर की सरकार ने तो बाकायदा इस मामले को निपटाने के लिए टास्क फोर्स का ही गठन कर दिया था. अयोध्या के धर्माचार्यों, प्रशासनिक अधिकारियों और न्यायविदों ने कुछ फार्मूले भी तय किये थे. पीवी नरसिंहराव की सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रमुख राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया से उसी वार्ता की अगली कड़ी के रूप में चर्चा हुई थी. उस समय विश्व हिन्दू परिषद तथा रामजन्मभूमि न्यास बाबरी ढांचे को हटाकर वहां शीघ्रातिशीघ्र भव्य राममंदिर के निर्माण पर अड़ा था. कल्याण िसंह के पहले कार्यकाल के दौरान रामजन्मभूमि न्यास को मंदिर निर्माण के लिए आवश्यक भूखण्ड का आवंटन भी हो गया था. भव्य मंदिर के निर्माण के लिए आस पास के भूखण्डों की अधिग्रहण की प्रक्रिया भी प्रारंभ हुई थी.

गड़करी महाराष्ट्र के सपूत हैं। उनकी सोच सर्वधर्मं समभाव वाली है.सवाल पैदा होता है कि क्या उनकी सोच को तथाकथित धर्मनिरपेक्षों कि बिरादरी सफल होने देगी? अयोध्या में राम मंदिर कि जगह पर बाबरी मस्जिद कायम रहे ये विचार इस देश के बहुसंख्यक मुसलामानों का कभी नहीं रहा है. इस्लाम कब बुतपरस्त हो गया जो किसी एक जगह पर सादे हुए ढाँचे को मस्जिद मान कर अड़ जाए? मक्का और मदीना में भी पुरानी मस्जिदों को हटाने कि परम्परा रही है. इस्लामी देशों में विकास के रास्ते पर आड़े आनेवाली मस्जिदों को हटाया जाता रहा है. मुंबई में बिल्डरों को फायदा पहुंचाने के लिए सत्ताधारी दलों के लोग मस्जिदें हटवाते रहे हैं. फिर बाबरी मस्जिद को लेकर मुसलमान क्यों अड़ गए?

भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष नितिन गडकरी जिस न्यायायलीन प्रक्रिया की दुहाई दे रहे हैं वह 1992 में लगभग उसी स्थिति में थी जिसमें 2010 में है. इस बीच बाबरी ढांचे का विध्वंस और उस परिसर में मेक-शिफ्ट राम मंदिर बन चुका है. इस बीच वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान परमहंस रामचंद्रदास के नेतृत्व में शिलापूजन का भी आह्वान किया गया था. शिलापूजन के दौरान तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ठीक उसी शैली में अड़ गये थे जिस शैली में कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह या मुलायम सिंह यादव अड़ा करते थे. अयोध्या आंदोलन से जुड़ा एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि उस समय रामरथी आडवाणी के रवैये से परमहंस रामचंद्रदास इतने आहत हुए कि वे फिर कभी स्वस्थ नहीं रह पाये. अटल बिहारी वाजपेयी ने परमहंस रामचंद्रदास की चिता पर जो संकल्प व्यक्त किया था उसके आड़े तत्कालीन वाजपेयी सरकार में कौन आया? भारतीय जनता पार्टी की साख को सबसे बड़ा बट्टा राममंदिर आंदोलन पर भ्रम की स्थिति बनाये रखने से लगा. परमहंस रामचंद्रदास के बाद विहिप ने कभी राममंिदर निर्माण के लिए कोई मुहिम क्यों शुरू नहीं किया? क्या संघ परिवार में अशोक सिंहल बिल्कुल अकेले पड़ गये थे? क्या संघ स्वयं राममंदिर निर्माण के प्रति गंभीर नहीं था? या फिर संघ के निर्णय भाजपा के राजभवन से हो रहे थे? अचानक गडकरी को राम जन्मभूमि का भूखण्ड मुसलमानों से मांगने की क्यों सूझी? क्या यह भी भाजपा के मुस्लिम पटाओ कार्यक्रम का हिस्सा है? भाजपा अध्यक्ष के भाषण में मुस्लिम आरक्षण का विरोध तो है लेकिन समान नागरिक कानून और धारा 370 के प्रति भाजपा के रूख की कहीं कोई चर्चा नहीं है.

भाजपा अध्यक्ष कहते हैं कि कश्मीर पर वार्ता में संयुक्त प्रगितिशील गठबंधन सरकार का रवैया सही नहीं है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान की दुहाई देते समय धारा 370 के संबंध में भाजपा का मौन क्यों है? भाजपा अध्यक्ष के भाषण में वाजपेयी सरकार के गौरवपूर्ण इतिहास पर प्रकाश डाला गया है. लेकिन वाजपेयी के शासनकाल में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय क्यों बिसार दिया गया था? भाजपा शासित राज्यों में दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय के विचारों को लागू करनेवाली कौन सी योजनाएं हैं? भाजपा का मुसलमानों से अनुनयवादी रुख क्या जो हिन्दू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा वाले नारे का पराभवकारी स्वरूप नहीं है? हिन्दू हित की बात करनेवाले मुसलमानों से रामलला के जन्मभूमि की भीख मांगने लगे, समान नागरिक संहिता को भूल गये और धारा 370 को अपने एजेण्डे से बाहर कर दिया. भाजपा का यह समझौतावादी चेहरा क्या विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के चेहरे से भिन्न है? जब राम जन्मभूमि का मुद्दा खबरों से पूरी तरह से बाहर है, बाबरी मस्जिद के नाम पर बनी तमाम कमेटियां और उसके नेता हाशिये पर भी जगह बनाने में सफल नहीं है, उस समय समझौते का सुर छेड़ने का क्या औचित्य? मुसलमान कभी बाबरी मस्जिद के साथ नहीं था. भाजपा के उग्र आंदोलन, छद्म सेकुलरों के स्यापे, मुस्लिम नेताओं की विखण्डनवादी नीतियों से मुसलमान बाबर की तुलना राम से करने की गलती कर बैठा था. अब भाजपा स्वयं राम की तुलना बाबर से करने की गलती कर रही है. इससे मामले का निपटारा तो दूर है, नये सिरे से विवाद जरूर पैदा हो जाएगा.