Tuesday, November 6, 2012




सुनहरे कल की कल्पना छलावा है मनमोहन जी!



आप कहते है कि हम एफडीआई के माध्यम से सुनहरे कल की तरफ बढ़ रहे है. जबकि हमने तो आपको किसी भी तरफ बढते नहीं देखा. आप बढ़ेंगें भी कैसे आपकी दिशाएं साफ़ नहीं है. आपको याद होगा कि वर्ष २००२ में जब आप राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे उस समय आपनें चेयरमैंन फ़ॉरेन ट्रेड कमिटी को एक पत्र लिखा था कि आपको तत्कालीन विदेश मंत्री नें यह आश्वासन दिया है कि रिटेल सेक्टर में फ़ॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट को मंजूरी नहीं दी जायेगी और जब आपकी बारी आयी तो आपने एफडीआई को रिटेल सेक्टर में मंजूरी दे दी. आखिर यह किसके लिए? उस अभिजात्य वर्ग के लिये जिन्हें चाहिए चकाचौंध बाजार, ऊँची-ऊँची इमारतें, मॉल, सेंसेक्स, चमकते शहर, बढती अमीरी या फिर उन गरीबों के लिए जो पंसारी की दूकान से हर हप्ते उधार राशन ले जाकर खाते है और महीना होने के पश्चात दिहाड़ी मिलने पर पंसारी के राशन का बिल चुकाते है. अगर आपके एफडीआई के माध्यम से गरीबी, बदहाली, अशिक्षा, बेरोजगारी और गाँव की बेजारी की तस्वीर नहीं बदलती जो कि दिख रही है. तो देश की 90 फीसदी जनता को आप गुमराह कर रहे है जब आप सत्ता में आये थे तब आपने यही कहा था

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