'छोटे' गांधी बने भाजपा के बड़े संकट
भाजपा के युवा तुर्क वरुण गांधी भारतीय जनता पार्टी के लिए गले की हड्डी बन गये हैं. दो एक दिनों में भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा होनेवाली है और वरुण गांधी को लेकर भाजपा और संघ में जबर्दस्त उहापोह की स्थिति बनी हुई है. संघ का दबाव है कि उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाए लेकिन भाजपा में एक वर्ग ऐसा है जो वरुण गांधी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने के सवाल पर विद्रोह के मूड में है.
वरुण गांधी भाजपा के टिकट पर पीलीभीत से सांसद हैं और वे भाजपा नेता प्रमोद महाजन की पहल पर भाजपा में आये थे. उनकी मां मेनका गांधी पहले भाजपा के समर्थन से लोकसभा पहुंचती जरूर थीं लेकिन सीधे तौर पर भाजपा में शामिल नहीं हुई लेकिन प्रमोद महाजन ने पहल करके वरुण को भाजपा में शामिल करवाया. पीलीभीत में हिन्दुओं के हित में दिये गये एक भाषण के कारण जेल की हवा खाकर बाहर आये वरुण गांधी धुर हिन्दुत्ववादी नेता की छवि उभरी है जिसके प्रशंसक न केवल भाजपा में हैं बल्कि संघ और सहयोगी शिवसेना भी वरुण गांधी को सच्चा गांधी मानती है.
शायद इसीलिए संघ वरुण गांधी को पार्टी का महासचिव बनाये जाने का दबाव बना रही है. लेकिन दिक्कत यह है कि अगर वरुण गांधी महासचिव बन जाते हैं तो उनकी सक्रियता मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में ही होगी ऐसे में प्रदेश के कुछ नेता इसकी खिलाफत कर रहे हैं. भाजपा अध्यक्ष के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि अगर एकदम से वरुण गांधी को महासचिव बना दिया गया तो पार्टी में विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी. एक तो उम्र में वे बहुत छोटे हैं ऊपर से पार्टी में उनसे अधिक सक्रिय और कार्यक्षम लोग हैं जिन्हें भाजपा महासचिव बनाने की संभावना है. लेकिन संघ का दबाव है कि वरुण गांधी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के साथ साथ उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी भी मिलनी चाहिए. उत्तर प्रदेश भाजपा के एक बड़े नेता और राम मंदिर आंदोलन के उग्र नेताओं में रहे एक नेता कहते हैं कि लोकसभा चुनावों में हार की जो समीक्षा हुई है उसमें वरुण गाँधी का भाषण भी कारण गिना गया है. आज जब पार्टी अध्यक्ष मुसलमानों को करीब लाकर सर्वधर्म समभाव की राजनीति की ओर आगे बढ़ रही है ऐसे में वरुण गांधी को आगे करने से पार्टी के प्रयासों को धक्का लगेगा. जाहिर है, उत्तर प्रदेश की कमान अगर वरुण के हाथ में दी जाती है तो भाजपा के अंदर ही कम घमासान नहीं होगा.
लेकिन संयोग से वरुण गांधी को राजनाथ सिंह के रुप में एक बड़ा समर्थक मिला हुआ है. उधर वरुण गांधी की मां मेनका गांधी ने भी वरुण को छूट दे दी है कि अगर वे भाजपा में अपना राजनीतिक भविष्य नहीं देखते हैं तो कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं. इंदौर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आये वरुण ने कहा भी था कि गांधी सुनने के नहीं सुनाने के अभ्यस्त होते हैं. साफ है, वरुण गांधी को अगर भाजपा में अपना भविष्य सुनिश्चित नहीं दिखता है तो वे उग्र हिन्दुत्व को मुद्दा बनाकर आगे अपनी सक्रियता किसी और प्रकार से भी बढा सकते हैं. इसके लिए उनकी मां का समर्थन उन्हें पहले ही मिल चुका है. बहरहाल, आखिरी निर्णय हुआ नहीं है, और जब होगा तभी साफ होगा कि छोटे गांधी को भाजपा कहां स्थापित करती है. वैसे एक अफवाह यह भी है कि बड़े भैया ने छोटे गांधी के पास संदेश भिजवाया है कि अगर उदार होकर राजनीति करनी है तो कांग्रेस अच्छा विकल्प साबित हो सकती है. सच्चाई कितनी है पता नहीं लेकिन अब तो गड़करी के पत्ते खोलने के बाद ही पता चलेगा कि वरुण गांधी का ऊंट किस करवट बैठेगा.


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