Thursday, March 11, 2010

सऊदी, सईद और इस्लामी आतंकवाद

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एक ओर तो भारतीय प्रधानमंत्री सऊदी अरब से मधुर रिश्ते स्थापित करने की गऱज़ से सऊदी अरब जा रहे हैं तथा अरब का शाही परिवार उनका अभूतपूर्व स्वागत कर रहा है और दोस्ती की राह पर आगे बढ़ने का संदेश दे रहा है तो दूसरी ओर यही सऊदी अरब पाकिस्तान में जमात-उद- दावा सहित ऐसे कई संगठनों की आर्थिक सहायता भी कर रहा है जोकि भारत के विरुद्ध आतंकवादी गतिविधियों में सक्रिय हैं।

वहाबी विचारधारा जोकि इस समय पूरी दुनिया के लिए इस्लामी आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रेरक बन चुकी है उसकी जड़ें दुनिया में और कहीं नहीं बल्कि सऊदी अरब में ही हैं। अर्थात यदि वहाबी विचारधारा अतिवादी इस्लाम के रास्ते पर चलना सिखाती है तो अतिवादी इस्लाम ही जेहाद शब्द को अपने तरीक़े से परिभाषित करते हुए इसे सीधे आतंकवाद से जोड़ देता है। 18वीं शताब्दी में सऊदी अरब के एक अतिवादी विचार रखने वाले मुस्लिम विद्वान मोहम्मद इब्रे अब्दुल वहाब द्वारा इस्लाम को कट्टरपंथी रूप देने का यह अतिवादी मिशन चलाया गया। उसने 'शुद्ध इस्लाम' के प्रचार व प्रसार पर बल दिया। जिसे वह स्वयं ज़रूरी समझता था उसे तो उसने इस्लामी कार्यकलाप बताया और जो कुछ उसकी नज़रों में उचित नहीं था उसे उसने गैर इस्लामी, बिदअत अथवा गैर शरई घोषित किया। मोहम्मद इब्रे अब्दुल वहाब का यह मत था कि मुस्लिम समाज के जो लोग गैर इस्लामी (उसके अनुसार)कार्यकलाप करते हैं वे भी काफिर हैं। अशिक्षित अरबों के मध्य वह जल्द ही काफी लोकप्रिय हो गया।

इस विचारधारा के विस्तार के समय अरब के मक्का व मदीना जैसे पवित्र शहरों में वहाबी समर्थकों ने बड़े पैमाने पर सशस्त्र उत्पात मचाया। परिणामस्वरूप मक्का व मदीना में बड़ी संख्या में निहत्थे मुस्लिम औरतों,बच्चों व बुज़ुर्गों का कत्लेआम हुआ। इन्हीं के द्वारा उस ऐतिहासिक मकान को भी ध्वस्त कर दिया गया जहां हज़रत मोहम्मद का जन्म हुआ था। इस विचारधारा के समर्थकों द्वारा अरब में स्थित तमाम सूफी दरगाहों तथा मज़ारों को भी नष्ट किया गया। आगे चलकर इसी विचारधारा ने सऊदी अरब की धरती पर ही जन्मे ओसामा बिन लाडेन जैसे मुसलमान को दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकवादी बनने के मार्ग पर पहुंचा दिया।

जब यही ओसामा बिन लाडेन दुनिया का मोस्ट वांटेड अपराधी बन जाता है तब यही सऊदी अरब की सरकार उसे देश निकाला देकर स्वयं को पुन: पाक-साफ, शांतिप्रिय तथा अविवादित स्थिति में ला खड़ा करती है। और तो और यदि उसे लाडेन या दुनिया के अन्य जेहादी अतिवादियों तथा आतंकवादियों के विरुद्ध कुछ कहना सुनना पड़े तो सऊदी अरब इससे भी नहीं हिचकिचाता। इस समय भारत-पाक रिश्तों में रोड़ा बनकर जो नाम सबसे आगे आ रहा है वह है पाकिस्तान स्थित जमाअत-उद-दावा के प्रमुख हाफिज मोहम्मद सईद का। हाफिज मोहम्मद सईद इस समय दुनिया का सबसे विवादित एवं मोस्ट वांटेड अपराधी बन चुका है। मुंबई में हुए 26-11 के हमले के योजनाकारों के रूप में उसका नाम सबसे ऊपर उभरकर सामने आया है। भारत में 26-11 के हमले के दौरान गिरफ्तार किए गए एकमात्र जीवित आतंकी अजमल आमिर कसाब ने ही हाफिज मोहम्मद सईद के 26-11 में शामिल होने की बात कही है। उसी ने पाकिस्तान के मुरीदके नामक आतंकी प्रशिक्षण कैंप से प्रशिक्षण प्राप्त करने की बात भी कुबूल की है। यह प्रशिक्षण केंद्र जमात-उद-दावा द्वारा संचालित है। नई दिल्ली में गत 25 फरवरी को भारत-पाक के मध्य हुई विदेश सचिव स्तर की बातचीत के दौरान भारत की ओर से पाकिस्तानी विदेश सचिव सलमान बशीर को जो तीन डोसियर सौंपे गए हैं उनमे हाफिज मोहम्मद सईद सहित 34 आतंकवादियों को भारत को सौंपने की मांग भी की गई थी। इस पर पाकिस्तान ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए यह साफ कर दिया है कि वह हाफिज सईद को भारत के हाथों कतई नहीं सौंपेगा।

पाकिस्तान व सऊदी अरब के मध्य कोई साधारण रिश्ते नहीं हैं बल्कि सऊदी अरब पाकिस्तान के प्रत्येक राजनैतिक उतार-चढ़ाव पर न केवल अपनी गहरी नज़र रखता है बल्कि पाकिस्तान पर अपना पूरा दखल भी रखता है।25 फरवरी को नई दिल्ली में हुई इस वार्ता के बाद हाफिज मोहम्मद सईद ने पाकिस्तान में एक टी वी चैनल को अपना साक्षात्कार दिया। इस साक्षात्कार में जहां उसने अन्य तमाम बातें कीं वहीं वह यह बताने से भी नहीं चूका कि उसकी सोच व फिक्र के पीछे सऊदी अरब में ग्रहण की गई उसकी शिक्षा का सबसे बड़ा योगदान है। संभवत: इसी अतिवादी शिक्षा के ही परिणामस्वरूप साक्षात्कार के दौरान उसने टी वी कैमरे के समक्ष अपना चेहरा रखने के बजाए कैमरे को अपनी पीठ की ओर करने का निर्देश दिया। पत्रकार द्वारा इसका कारण पूछे जाने पर उसने यही कहा कि फोटो खिंचवाना इस्लामी शरिया के लिहाज़ से जायज़ नहीं है। गौरतलब है कि हाफिज सईद इस्लामी शिक्षा का प्रोफेसर रह चुका है तथा शैक्षिक व्यस्तताएं छोड़कर अब जमात-उद- दावा संगठन गठित कर इसी के अंतर्गत तमाम स्कूल स्तर के मदरसे, जेहादी विचारधारा फैलाने वाली शिक्षा देने, अस्पताल चलाने तथा अन्य गैर सरकारी संगठन संचालित करने का काम कर रहा है। उसका स्वयं मानना है कि जमात के माध्यम से दुनिया के मुसलमानों को अपने साथ जोडऩा, उनका सुधार करना तथा इस्लामी शिक्षा का वैश्विक स्तर पर प्रचार व प्रसार करना उसके जीवन का मुख्य उद्देश्य है। हाफिज सईद स्वयं न केवल यह स्वीकार करता है बल्कि बड़े गर्व से यह बताता भी है कि धर्म के नाम पर चलने की सीख उसने सऊदी अरब में रहकर वहां के धर्माधिकारियों से ही हासिल की है।

गौऱतलब है कि 26-11 के बाद भारत द्वारा पाकिस्तान पर अत्यधिक दबाव डालने के बाद पाकिस्तान द्वारा हाफिज सईद को नज़रबंद कर दिया गया था। उस समय सऊदी अरब से अब्दुल सलाम नामक मध्यस्थताकार पाकिस्तान आए थे जिन्होंने हाफिज सईद व पाक सरकार के मध्य समझौता कराने में अहम भूमिका अदा की थी। आज यह घटना क्या हमें यह सोचने के लिए मजबूर नहीं करती कि आखिर हाफिज सईद के प्रति सऊदी अरब की इस हमदर्दी की वजह क्या थी? इसी समझौते के बाद न सिर्फ हाफिज सईद की नज़रबंदी हटाई गई बल्कि उसके बाद से ही उसने पाकिस्तान के प्रमुख शहरों में जनसभाओं व रैलियों के माध्यम से भारत के विरुद्ध जेहाद छेडऩे जैसा नापाक मिशन भी सार्वजनिक रूप से चलाना शुरु कर दिया। इसी सिलसिले में एक बात और याद दिलाता चलूं कि पाकिस्तान में इस्लाम को अतिवादी रूप देने के जनक समझे जाने वाले फौजी तानाशाह जनरल जिय़ा उल हक के सिर पर भी सऊदी अरब की पूरी छत्रछाया थी। एक और घटना का उल्लेख करना यहां प्रासंगिक होगा। जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने जब नवाज़ शरीफ की सरकार का तख्ता पलटा तथा उन्हें जेल में डाल दिया उस समय भी सऊदी अरब ने मध्यस्थता कर नवाज़ शरीफ को जनरल परवेज़ मुशर्रफ के प्रकोप से बचाने में उनकी पूरी मदद की थी तथा शरीफ को सऊदी अरब बुला लिया गया था।

लश्करे तैयबा जोकि पाकिस्तान स्थित सबसे खूंखार आतंकी संगठन है तथा जिस पर 26 फरवरी को काबुल में हुए भारतीयों पर हमले करने का भी ताज़ातरीन आरोप है उस संगठन के प्रति हाफिज सईद ने अपनी पूरी हमदर्दी का इज़हार भी किया है। उसने अपने साक्षात्कार में साफतौर पर यह बात कही है कि वह न केवल लश्करे तैयबा के साथ है बल्कि प्रत्येक उस संगठन के साथ है जो कश्मीर की स्वतंत्रता के लिए जेहाद कर रहे हैं। जेहाद को भी हाफिज सईद अपने ही तरीक़े से परिभाषित करते हुए यह कहता है कि किसी ज़ालिम से स्वयं को बचाने हेतु की जाने वाली जद्दोजहद को ही जेहाद कहते हैं। उसके अनुसार वह कश्मीरी मुसलमानों को भारतीय सेना से बचाने हेतु जो प्रयास कर रहा है वही जेहाद है।

सऊदी अरब से अतिवादी शिक्षा प्राप्त करने वाला यह मोस्ट वांटेड अपराधी कश्मीर में सशस्त्र युद्ध को भी सही ठहराता है तथा इसमें शामिल लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देता है। वह संसद पर हुए हमले तथा 26-11 के मुंबई हमलों में अपनी संलिप्तता होने से तो इंकार करता है परंतु जब उससे यह पूछा गया कि सार्वजनिक रूप से आपके यह कहने का क्या अभिप्राय है कि 'एक मुंबई काफी नहीं'। इसके जवाब में हाफिज सईद के पास बग़लें झांकने के सिवा कुछ नहीं था। वह भारत द्वारा सौंपे गए डोसियर को भी अपने विरुद्ध प्रमाण नहीं बल्कि साहित्य बताता है। उसने साफ तौर पर पाक सरकार को यह भी कहा है कि वह भारत के विरुद्ध जेहाद का एलान कर जंग की घोषणा करे अन्यथा पाक स्थित धर्मगुरु भारत के विरुद्ध जेहाद घोषित करने के बारे में स्वयं फैसला लेंगे। उसका कहना है पाकिस्तान का बच्चा-बच्चा तथा जमात-उद- दावा के सदस्य पाकिस्तान के साथ भारत के विरुद्ध लडऩे को तैयार हैं।

(तनवीर जाफरी हरियाणा साहित्य अकादमी के सदस्य हैं. tanveerjafri1@gmail.com)

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