बिहार में गड़ेगे या उखड़ेंगे गड़करी?
इस साल के अंत तक बिहार में विधानसभा के चुनाव होने हैं. बिहार में भाजपा जद (यू) के साथ मिलकर सत्ता में है. लेकिन सत्ता में रहते हुए संगठन के स्तर पर पार्टी बेहद कमजोर हो चुकी है. नवनिर्वाचित भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के लिए बिहार में भाजपा को दोबारा सत्ता में लाना जितनी बड़ी चुनौती होगा उससे बड़ी चुनौती साबित हो रही है वहां नये पार्टी अध्यक्ष का चुनाव. बिहार भाजपा की राजनीति पर एक विश्लेषण-
कयास यह लगाये जा रहे हैं कि आने वाले छह महीनों के बाद कभी भी बिहार में विधानसभा का चुनाव कराया जा सकता है। अगर नितिश कुमार ने राजनीतिक चतुराई और समझदारी दिखाई तो चुनाव इसके पूर्व भी हो सकता है। लेकिन राजनैतिक स्थिति भाजपा के एकदम खिलाफ होता जा रहा है। राजनीतिक उहापेाह की स्थिति में बिहार भाजपा उदासीन भाव में है। उसका अपना परंपरागत वोट काफी कम बचा है। कई उच्च जातियों, खासकर ब्राह्मणों और मुसलमानों का बड़ी तेजी से ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में हो रहा है। भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष राधामोहन सिंह सिर्फ अपने क्षेत्र और जिले के नेता बनकर रह गए हैं। पार्टी को ठीक से न चलाने में वहां के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार काफी मदद कर रहे हैं। बची-खुची कसर वहां के उप-मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी ने पूरी कर दी है। मोदी द्वारा पाटी और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के कारण उनका काफी विरोध हो रहा है। मोदी में अब पाटी और कार्यकर्ताओं के साथ पहले जैसा लगाव भी नहीं रहा। वे पार्टी और कार्यकर्ताओं को अपनी जेब में रखना चाहते हैं। इसी कारण मोदी की खूबियों का लाभ भी पार्टी को नहीं मिल पा रहा है। उड़ीसा और उत्तरप्रदेश का उदाहरण भाजपा के सामने है जहां गढबंधन सरकारों का लाभ लेकर बीजद, बसपा सपा और जनता दल यू जैसी पार्टियां तो फली-फूली लेकिन भाजपा लोगों और कार्यकर्ताओं से दूर होती गई।
बिहार में भी कमोबेश यही स्थिति है। भाजपा-जदयू गठजोड़ सरकार की मदद से नीतिश कुमार और उनकी पार्टी तो फायदे में है, लेकिन भाजपा घाटे में। भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता, परंपरागत मतदाता और समर्थक अब पार्टी से दूरियां बनाने लगे हैं। पिछड़ी जातियों में जनता दल यू और राजद का दबदबा बढ़ रहा है, वहीं मुस्लिम मतों के लिए राजद, जनता दल यू के साथ ही कांग्रेस भी भारी मशक्कत कर रही है। ब्राह्मण कांग्रेस का परंपरागत समर्थक रहा है, कुछ समय तक वह कांग्रेस से दूर होकर भाजपा के साथ आ गया था, नेतृत्व के आभाव में वह फिर से कांग्रेस की ओर मुखातिब है। राहुल की टीम ने बिहार में उच्च जातियों, खासकर ब्राह्मणों और मुसलमानों को लामबंद करने की रणनीति बनाई है। भाजपा उहापोह में है। उसके पास न तो दमदार जातीय पकड़ वाला नेता है और न ही हिन्दुत्व का चेहरा।
भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का पहला फिल्ड टेस्ट बिहार में होना है। बिहार वह प्रदेश है जहां भाजपा अध्यक्ष के रूप में नितिन गडकरी को पहला चुनाव फेस करना होगा। यहां की सरकार में भाजपा भागीदार है। पार्टी के वरिष्ठ और जुझारू नेता सुशील कुमार मोदी बिहार के उप-मुख्यमंत्री हैं। गौरतलब है कि मोदी के खिलाफ लंबे अरसे से विरोध की आवाज उठती रही है, लेकिन मोदी भी भरसक प्रयास करते रहे हैं कि उनका कुनबा, गुट और गिरोह कमजोर न पड़े।
बिहार में भाजपा इन्हीं सवालों से जूझ रही है। आपसी खींचतान और गुटबाजी कम नहीं हुई। जनाधार भी लगातार खिसक रहा है। ऐसे में युवा और कुशल नेतृत्व की दरकार प्रदेश भाजपा को है। ऐसा नेतृत्व जो पुराने को साध सके, नए में उत्साह भर सके और आम जनता को अपनी ओर आकर्षित कर सके। प्रदेश भाजपा के ही साथ, संघ और नितिन गडकरी की टीम ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो सक्षम और योग्य हो। वर्तमान संगठनात्मक और चुनावी जरूरतों को पूरा करने वाला हो। गौरतलब है कि इस लिहाज से प्रदेश भाजपा के कई नेता अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। सर्वाधिक युवा नेता और सुशील मोदी के खासमखास मंगल पाण्डेय भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी पाने के लिए जुगाड़ लगा रहे हैं। प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी स्वयं उनकी लॉबिंग कर रहे हैंं। लेकिन भाजपा, संघ और स्वतंत्र विश्लेषकों ने मंटू पाण्डेय को सुशील मोदी का आदमी बता कर अध्यक्ष पद की शुरुआती दौड़ से ही बाहर कर दिया है। इसके अलावा संघ के कुछ पसंदीदा नाम चर्चा में है। इनमें सबसे अधिक चर्चा रामनगर (बेतिया) के विधायक और भूमिहार नेता चन्द्रमोहन राय की है। राय युवा हैं, संघ परिवार से भी अच्छा संबंध रखते हैं और भाजपा के युवा नेता भी इन्हें पसंद करते हैं। भूमिहार नेता होने के कारण वे उच्च जातियों में भाजपा की पैठ बरकरार रख सकते हैं। इनके अलावा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की पृष्ठभूमि से राजनीति में आए ओबीसी नेता श्री रामेश्वर चैरसिया का नाम भी चर्चा में है।
बिहार के मौजूदा राजनीतिक हालात और पार्टी की स्थिति के मद्देनजर पार्टी अध्यक्ष के लिए वर्तमान सरकार में मंत्री और ब्राह्मण नेता श्री अश्विनी चैबे का नाम सबसे उपर है। वे पार्टी गुटबाजी से अलग किन्तु कार्यकर्ताओं के बीच खासे लोकप्रिय हैं। संघ भी उन्हें पसंद करता है। लेकिन सुशील मोदी उन्हें पसंद नहीं करते। भाजपा अगर सरकार का मोह छोड़ पार्टी, संगठन और कार्यकर्ताओं का विचार करेगी तो अश्विनी चैबे भाजपा अध्यक्ष बन सकते हैं। वे आने वाले चुनाव के लिए बेहतर टीम लीडर हो सकते हैं। लेकिन सुशील मोदी के विरोध का सामना उन्हें तब भी करना होगा। संभव है पार्टी के रणनीतिकार और गडकरी के सलाहकार मोदी के विरोध के बाद भी चैबे के नाम पर अपनी सहमति दे देंगे। अगर भाजपा में अध्यक्ष को लेकर विरोध और अन्तर्विरोध अधिक बढ़ा तो आरा के विधायक अमरेन्द्र प्रताप सिंह के नाम पर सर्वानुमति बन सकती है। वे संघनिष्ठ और कार्यकर्ताओं की पसंद बताए जाते हैं। संघ और भाजपा संगठन की कोशिश है कि पार्टी को सुशील मोदी की छाया से बाहर लाया जाए। भाजपा को नया और सक्षम अध्यक्ष देने के लिए नितिन गडकरी परेशान हैं। बिहार उनकी पहली अग्नि-परीक्षा है। इस अग्नि परीक्षा में वे और अधिक निखर कर निकलें इसके लिए बिहार में पाटी और सरकार की लड़ाई उन्हें जीतनी ही होगी। पार्टी अध्यक्ष के लिए उपयुक्त नाम की तलाश के लिए वे पशोपेश में हैं।


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